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  • हाई कोर्ट का याचिकाकर्ता को झटका, नहीं दी राहत

नागपुर. कोरोना महामारी के दौरान अत्यंत आवश्यक दवा को लेकर सरकारी टेंडर भरने के नाम पर डॉक्टर के साथ हुई धोखाधड़ी को लेकर अंबाझरी पुलिस की ओर से मामला दर्ज किया गया. मामले में गिरफ्तारी की संभावना के चलते गिरफ्तारी पूर्व जमानत के लिए अंकुश मोहोड़ ने  हाई कोर्ट में याचिका दायर की.

इस पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि केस पेपर्स के साथ मुंबई महानगरपालिका के दस्तावेज तो प्रस्तुत किए गए, किंतु इनमें याचिकाकर्ता द्वारा टेंडर में हिस्सा लेने के कोई सबूत नहीं हैं जिससे निश्चित ही केवल धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से पूरे मामले को अंजाम दिए जाने का हवाला देते हुए न्यायाधीश विनय जोशी ने याचिकाकर्ता को अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया. साथ ही अर्जी ठुकरा दी. याचिकाकर्ता की ओर से अधि. वी.ई. देशपांडे और सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील ए.एम. देशपांडे ने पैरवी की. 

निवेश के नाम पर 34.70 लाख लिए

अभियोजन पक्ष के अनुसार सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने के लिए शिकायतकर्ता डॉक्टर से याचिकाकर्ता ने 34,70,000 रु लिए थे. यहां तक कि विश्वास संपादन करने के लिए याचिकाकर्ता ने डॉक्टर को कुछ फर्जी दस्तावेज भी दिखाए थे. शिकायतकर्ता मेडिकल अधिकारी अस्पताल में याचिकाकर्ता के सम्पर्क में आया था. जान-पहचान होने पर याचिकाकर्ता ने डॉक्टर से कहा कि कोरोना के इस संकटकाल में आरसेनिक अल्बम नामक दवा की भारी मांग है. इसके लिए सरकार द्वारा टेंडर निकाले जा रहे हैं. यदि डॉक्टर की इच्छा हो तो इसमें निवेश कर सकता है. टेंडर मिलने के बाद इससे भारी मुनाफा होने का लालच भी दिया. सरकारी टेंडर का हवाला मिलने से डॉक्टर ने निवेश के लिए रकम तो दी लेकिन वापस भुगतान नहीं हुआ. 

औरंगाबाद स्वास्थ्य उप संचालक के फर्जी स्टाम्प

अदालत ने आदेश में कहा कि केस पेपर्स के साथ प्रस्तुत बैंक दस्तावेजों के अनुसार शिकायतकर्ता डॉक्टर की ओर से याचिकाकर्ता के खाते में 34,70,000 रु. जमा किए जाने का खुलासा हो रहा है. यहां तक कि मुंबई महानगरपालिका के दस्तावेजों के अनुसार याचिकाकर्ता द्वारा टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिए जाने का खुलासा हो रहा है. इसी तरह सरकारी पक्ष की ओर से कुछ दस्तावेज भी पेश किए गए जिनमें औरंगाबाद के स्वास्थ्य उप संचालक के फर्जी स्टाम्प मिलने दस्तावेज प्रस्तुत किए गए जिसका बचाव पक्ष की ओर से विरोध किया गया. अदालत ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता कभी भी सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने का इच्छुक नहीं था. लेकिन इसी आधार पर उससे भारी राशि ली जिसकी छानबीन होना जरूरी है.