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  • प्रारूप पर HC ने मांगा खुलासा

नागपुर. वेतन श्रेणी को लेकर राज्य सरकार को भेजे गए प्रस्ताव पर निर्णय नहीं लिए जाने पर आपत्ति जताते हुए प्रवीण बांदरे और अन्य की ओर से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया, जिस पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश सुनील शुक्रे और न्यायाधीश अविनाश घारोटे ने सरकार को भेजे गए प्रस्ताव पर ही आपत्ति जताते हुए इस संदर्भ में मनपा को खुलासा करने के आदेश दिए.

अदालत का मानना था कि कर्मचारियों की वेतन श्रेणी या आकृतिबंध को लेकर विस्तृत प्रस्ताव होना चाहिए, जिसमें सम्पूर्ण जानकारी दी जानी चाहिए. याचिका पर सुनवाई के दौरान मनपा का मानना था कि राज्य सरकार को याचिकाकर्ता के वेतन श्रेणी का प्रस्ताव तो भेजा गया लेकिन इसमें सरकार द्वारा कुछ खामियां निकाली गई, जिससे प्रस्ताव लंबित है.

किस तरह के पड़ेंगे वित्तीय प्रभाव

अदालत का मानना था कि याचिकाकर्ताओं की वेतन श्रेणी को लेकर 31 मई 2010 को ही स्थायी समिति की ओर से मंजूरी प्रदान की गई थी. मंजूरी के लिए वित्त विभाग की ओर से स्थायी समिति के समक्ष जो प्रस्ताव रखा गया था. उसकी प्रति ही राज्य सरकार की मंजूरी के लिए भेज दी गयी. मनपा की ओर से इसे ही प्रस्ताव कहा जा रहा है. केवल स्थायी समिति द्वारा मंजूर विषय को प्रस्ताव नहीं कहा जा सकता है, जबकि प्रस्ताव का एक प्रारूप होता है जिसमें कितने कर्मचारी, कितने लाभार्थी और इससे मंजूरी के बाद कितना वित्तीय बोझ पड़ेगा. जैसी तमाम जानकारी का समावेश होता है. अत: सरकार को किस तरह का प्रस्ताव भेजा गया. इसका खुलासा मनपा को करने के आदेश दिए गए.

पहले ही पड़ चुकी है फटकार

उल्लेखनीय है कि गत सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार हलफनामा दायर नही करने तथा पुन: समय मांगे जाने पर हाई कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई थी. हालांकि हाई कोर्ट की ओर से अनुरोध को स्वीकार कर अंतिम मौका तो प्रदान किया था. किंतु अगली सुनवाई के दौरान हलफनामा दायर नहीं करने पर प्रतिवादियों को 5,000 रु. का जुर्माना भरने के आदेश भी दिए थे. मनपा की ओर से पैरवी कर रहे वकील का मानना था कि स्टाफिंग पैटर्न को मंजूरी देने के लिए 4 फरवरी 2017 को राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था. यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जाती है तो याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों का औचित्य ही नहीं रहेगा.