MLA tekchand sawarkar

    नागपुर. विधानसभा चुनावों के दौरान नामांकन पत्र के साथ जोड़े जाने वाले दस्तावेजों में गड़बड़ी और अधूरी जानकारी होने का हवाला देकर विधायक टेकचंद सावरकर का चुनाव रद्द करने की मांग को लेकर सुधाकर हटवार की ओर से हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर की गई. इस पर लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने याचिका के साथ जोड़े गए दस्तावेजों में वैध आंकड़ों और तथ्यों की कमी का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता की ओर से अधि. आर.एम. भांगडे और विधायक सावरकर की ओर से अधि. हरीश डांगरे ने पैरवी की. मतदाता के रूप में याचिकाकर्ता ने याचिका में कहा कि नामांकन पत्र के साथ प्रत्याशी को उस पर निर्भर परिजन, सम्पत्ति, दायित्व, बैंक खातों की जानकारी, गिरवी सम्पत्ति और अन्य कर्ज आदि की जानकारी देना अनिवार्य होता है. 

    याचिका का आधार पुख्ता नहीं

    अदालत ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने सावरकर का नामांकन अवैध रूप से स्वीकार किए जाने का आरोप तो लगाया लेकिन इस संदर्भ में याचिका के आधार को पुख्ता करने के कोई भी तथ्य प्रस्तुत नहीं किए. इसे देखते हुए प्रतिवादी पक्ष की ओर से इसी स्तर पर याचिका को खारिज करने की मांग की गई है. नामांकन पत्र के साथ दिए गए शपथपत्र में कई प्रकार की अधूरी जानकारी होने का आरोप तो याचिका में लगाया गया है किंतु संविधान, प्रतिनिधि कानून या नियम या आदेशों के अनुसार किसका पालन नहीं किया गया इसे लेकर किसी तरह का खुलासा नहीं किया गया है. प्रतिवादी पक्ष की ओर से याचिका के प्रत्येक मुद्दे का विस्तार से जवाब देते हुए कहा गया कि कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए कोई भी पुख्ता जानकारी या दस्तावेज तक प्रस्तुत नहीं किए गए हैं. सुनवाई के दौरान भी इसके तथ्य पेश नहीं किए गए. 

    ‘चुनाव प्रभावित होना’ साबित करना जरूरी नहीं

    याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधि. भांगडे ने कहा कि गलत तरीके से नामांकन पत्र स्वीकृत किए जाने से वास्तविक रूप में चुनाव प्रभावित होने को साबित करना जरूरी नहीं है जिसके लिए याचिकाकर्ता की ओर से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव याचिका पर दिए गए कुछ फैसलों का भी हवाला दिया गया. इसका निर्णय केवल सुनवाई के दौरान सबूतों को रिकॉर्ड करते समय अदालत द्वारा किया जा सकता है. सम्पत्ति के विवरण में देना बैंक का कर्ज बचा होने की जानकारी नहीं दिए जाने का हवाला याचिकाकर्ता की ओर से दिया गया लेकिन यह जानकारी किस आधार पर गलत है, इसका खुलासा याचिकाकर्ता की ओर से नहीं किया जा रहा है. इसी तरह से नामांकन पत्र भी अधूरा होने के कोई पुख्ता सबूत या दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उक्त आदेश जारी किए.