Court approves sacking of 12 Manpa employees, High Court validates Munde's decision

    नागपुर. हत्या के मामले में सत्र न्यायालय ने भले ही आरोपी को दोषी करार देकर उम्र कैद की सजा दी हो लेकिन जिस मृत्युपूर्व बयान के आधार पर फैसला सुनाया गया, उस पर विश्वास करना असुरक्षित होने का हवाला देकर हाई कोर्ट के न्यायाधीश वीएम देशपांडे और न्यायाधीश अमित बोरकर ने सत्र न्यायालय का फैसला खारिज कर दिया. साथ ही याचिकाकर्ता को निर्दोष बरी करने के आदेश दिए. सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ लोकेश बारसागडे ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी. इस पर लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने यह आदेश जारी किया. याचिकाकर्ता की ओर से अधि. राजेन्द्र डागा और सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील एमए बाराबड़े ने पैरवी की. 

    पेट्रोल डालकर जलाने का आरोप

    अभियोजन पक्ष के अनुसार 15 अक्टूबर 2012 की दोपहर 3.30 बजे के करीब विलास भोगे अपनी चाय की टपरी पर चाय बना रहा था. इसी दौरान मोटरसाइकिल पर लोकेश वहां पहुंच गया. डिक्की से पेट्रोल भरी प्लास्टिक कैन निकालकर विलास पर डालना शुरू कर दिया. स्टोव में जल रही आग और पेट्रोल के कारण आग भड़क गई जिसमें विलास बुरी तरह से झुलस गया. तुरंत टपरी से बाहर आकर विलास ने कपड़े निकाल लिए और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा. डॉ. अश्विन भोयर ने उसे प्राथमिक उपचार दिया. 15 अक्टूबर को डॉक्टर की उपस्थिति में हेडकांस्टेबल विजय राऊत ने विलास का बयान दर्ज किया. इसी दिन पुलिस कर्मचारी कृष्णा भूते ने भी पीड़ित का बयान दर्ज किया था. उपचार के लिए पीड़ित को सामान्य अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां नायब तहसीलदार नवनाथ कातखाडे ने पीड़ित की मृत्यूपूर्व बयान दर्ज किया. 23 अक्टूबर को पीड़ित की मृत्यु हो गई.

    तीनों बयानों में विसंगतियां

    सुनवाई के दौरान अधि. डागा ने कहा कि पीड़ित के मृत्यूपूर्व बयान के आधार पर याचिकाकर्ता को सजा सुनाई गई है, जबकि मृत्युपूर्व तीनों बयानों में विसंगतियां हैं. अदालत ने फैसले में कहा कि कोर्ट की यह जिम्मेदारी है कि मृत्युपूर्व बयान की अच्छी तरह से जांच होनी चाहिए. साथ ही मृत्युपूर्व बयान  किसी अन्य द्वारा अनुवाद कर बताया गया नहीं है, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए. यदि मृत्युपूर्व बयान संदेहजनक हो तो उसे सबूत के तौर पर लेते समय सावधानी बरतनी चाहिए. जहां पीड़ित होश में न हो और उसका बयान दर्ज किया जाए, तो ऐसे सबूतों को खारिज किया जाना चाहिए. इस संदर्भ में स्थापित कानून का हवाला देते हुए अदालत ने सत्र न्यायालय के फैसले को खारिज करने के आदेश दिए.