stork birds

    नागपुर. सम्पूर्ण देश के साथ ही विदर्भ के पर्यावरण के मूलभूत महत्व और जंगलों पर असर को लेकर उजागर हो रही जानकारी का हवाला देते हुए हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने विशेष रूप से पर्यावरणीय असंतुलन के कारण सारस पक्षियों की प्रजाति पर पड़ते प्रभाव को लेकर स्वयं संज्ञान लेकर इसे जनहित में स्वीकार किया. सुनवाई के दौरान अदालत मित्र अधि. राधिका बजाज जायसवाल द्वारा इसे याचिका के रूप में अदालत के समक्ष रखा गया जिसके बाद न्यायाधीश सुनील शुक्रे और न्यायाधीश अनिल किल्लोर ने राज्य सरकार सहित तमाम संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह में जवाब दायर करने के आदेश दिए. अदालत ने पुणे के महाराष्ट्र स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड को प्रतिवादी के रूप में शामिल कर उसे भी नोटिस जारी किया. राज्य सरकार की ओर से मुख्य सरकारी वकील केतकी जोशी ने पैरवी की. 

    सम्पूर्ण देश के लिए महत्वपूर्ण

    अदालत ने आदेश में कहा कि पहले ही इस मुद्दे को लेकर हाई कोर्ट ने इसके महत्व को उजागर किया है लेकिन यहीं रुकना संभव नहीं है. सारस पक्षियों की प्रजाति पर उभरते खतरे को देखते हुए पूरा मुद्दा न केवल विदर्भ बल्कि पूरे देश के लिए और वन तथा पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो रहा है. इस तरह की प्रजातियों को बनाए रखने के लिए पर्यावरण का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. लगातार विलुप्त होती इस तरह की प्रजातियां भविष्य के लिए खतरे की घंटी होने की जानकारी याचिका में उजागर की गई. 

    विलुप्त होने की कगार पर 

    गत सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन के कारण सारस पक्षी खतरे में है. यहां तक कि लगातार उनकी घटती आबादी के चलते अब ये प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है. इस संदर्भ में विस्तृत याचिका पेश होना जरूरी है जिससे प्रत्येक पहलुओं पर विस्तार से बहस हो सकेगी. अदालत ने अदालत मित्र को सटीक याचिका तैयार करने तथा प्रतिवादियों को याचिका की कापी उपलब्ध कराने के आदेश भी पहले ही दिन दे दिए थे. याचिका की प्रति मिलते ही सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने के आदेश दिए. अदालत ने राज्य के पर्यावरण मंत्रालय तथा वन विभाग के अलावा अन्य विभागों को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह में जवाब दायर करने आदेश भी दिए.