14 लाख की आबादी के लिए 14 वेंटिलेटर

नवी मुंबई. सेटेलाईट सिटी नवी मुंबई में कोरोना थमने का नाम नहीं ले रहा है. सोमवार को आई मनपा की ताजा रिपोर्ट में 122 नए कोरोना मामले आए हैं. फिलहाल नवी मुंबई में कोरोना मरीजों की संख्या 43,748 तक पहुंच गयी है. इनमें से 2187 एक्टिव मरीज हैं जिनका अलग अलग अस्पतालों में इलाज चल रहा है.

तमाम प्रयासों के बावजूद जिस तरह कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है उसके लिहाज से उपचार सुविधाएं कम पड़ रही हैं लेकिन सच्चाई ये है कि इसके लिए पहले जैसा शोर सराबा नहीं हो रहा है. बीते हफ्ते ऐरोली के बीजेपी विधायक गणेश नाईक ने त्यौहारी सीजन में मनपा आयुक्त को आगाह किया था कि भीड़ में सोशल डिस्टेंसिंग का जिस तरह मजाक बन रहा है उससे कोरोना फैलने का खतरा ज्यादा है. इसलिए व्यापक जागरूकता और नियंत्रण जरूरी है. हालांकि मनपा ने कुछ नहीं किया.

खाली नहीं हैं वेटिलेटर बेड-हॉस्पिटल

नवी मुंबई की आबादी 14 लाख के पार है, इनमें 40 हजार से अधिक लोग कोरोना पॉजिटिव होकर ठीक हो चुके हैं. नवी मुंबई मनपा का दावा है कि शहर में कोरोना उपचार के लिए पर्याप्त उपचार इंतजाम मौजूद हैं लेकिन व्यवस्थाओं पर नजर डालें तो इसकी सच्चाई कुछ ही दिखती है. कोविड डैश बोर्ड पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार नवी मुंबई में कुल 443 आईसीयू बेड हैं जिनमें सिर्फ 64 खाली हैं. 2130 आक्सीजन बेड हैं जिनमें से 1302 खाली हैं जबकि कुल 163 वेंटिलेटर हैं लेकिन सिर्फ 14 खाली हैं. गौर किजीए कि 14 लाख की आबादी वाले शहर में मात्र 14 वेंटिलेटर खाली हैं. सूत्रों की मानें तो यह सिर्फ अमीर और पैसे वालों के लिए हैं. गरीब और सामान्य लोगों के लिए वेंटिलेटर का पता पूछिए, हॉस्पिटल से जवाब मिलता है कि उपलब्ध नहीं हैं.नवभारत संवाददाता ने कई अस्पतालों में फोन किया, हर जगह से यही उत्तर मिला जो इसकी पुष्टि करता है.

पहले पूछते हैं इन्श्योरेंस क्या !

कोरोना महामारी का भले ही उपचार नहीं है लेकिन हास्पिटल लाखों का बिल बना रहे हैं. सैकड़ों मरीजों ने इसके खिलाफ शिकायत की है. नवी मुंबई में अब तक 90 लाख रुपयों तक की रिकवरी हो चुकी है जिसे हास्पिटलों ने इलाज के नाम  पर मरीजों से लूट लिया था. पनवेल मनपा ने 2 बड़े हास्पिटलों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उपचार समझौता  रद्द कर दिया है. यह सब सिर्फ पैसे कमाने की होड़ में हो रहा है.

मरीज बताते हैं कि उन्हें एडमिट करने से पहले पूछा जाता है, इंश्योरेंस है क्या..अगर नहीं तो बेड नहीं है. अगर बीमा है तो उल जूलूल लूट करने का रास्ता है और फिर बेड उपलब्ध करा दिया जाता है. लेकिन अन्दर बेड पर कोई इलाज नहीं होता, सिर्फ टाइमपास होता है और बिल लाखों के बन जाते हैं. ताज्जुब इस बात का है इतने गंभीर मामले में शिकायतों के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही जो सवाल खड़े करती है.