Governments have no concern about migrant workers: Mayawati

    -राजेश मिश्र

    लखनऊ. गुरुवार को  विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा और पूर्व मंत्री राम अचल राजभर के बाद शुक्रवार सुबह बहुजन समाज पार्टी के प्रमुख नेता और दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री देव नारायण सिंह उर्फ जीएम सिंह ने मायावती का साथ छोड़ दिया। 19 विधायकों वाली बसपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में महज सात विधायक बचे रह गए हैं।

    लगातार ताश के पत्तों की तरह फेंटे जाने के चलते बसपा के संगठन की मजबूत धुरी समझे जाने वाले जोनल को-आर्डिनेटरों में भी भगदड़ मचने लगी है। कहना तो यहां तक है कि विधानसभा चुनाव से पहले बसपा में नेताओं में और भी भगदड़ मचने वाली है और शायद ही कोई बड़ा नेता बचा रहे।

    गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 19 सीटें जीती थीं। अंबेडकरनगर जिले के उपचुनाव में एक सीट हारने के बाद पार्टी के पास 18 विधायक रह गए। पिछले साढ़े चार वर्षों में अलग-अलग समय पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में बसपा के 9 विधायक पहले से निलंबित चल रहे हैं। दो और के निष्कासन से अब पार्टी में सिर्फ सात विधायक बचे हैं।

    बसपा में फिलवक्त विधायकों में केवल शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली, सुखदेव राजभर, श्याम सुंदर शर्मा, उमाशंकर सिंह, मुख्तार अंसारी, विनय शंकर तिवारी और आजाद अरिमर्दन ही बचे हैं। इनमें से शाह आलम को लालजी वर्मा की जगह पर गुरुवार को बसपा विधानमंडल दल के नए नेता के तौर पर मनोनीत किया गया है। बसपा अपने नौ विधायकों असलम राइनी, असलम अली, मुजतबा सिद्दीकी, हाकिम लाल बिंद, हरगोविंद भार्गव, सुषमा पटेल, वंदना सिंह, अनिल सिंह और रामवीर उपाध्याय को निलंबित कर चुकी है।

    बीते कुछ समय से बसपा से निकाले जाने वाले या छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं को साइकिल की सवारी ही ज्यादा रास आ रही है। माया और भाजपा की जुगलबंदी से खफा ज्यादातर मुस्लिम नेताओं को सपा में जाना ज्यादा मुफीद नजर आ रहा है तो अपने अपने क्षेत्रों में पकड़ रखने वाले कई अन्य जातियों के नेता भी समाजवादी खेमें में ही जा रहे हैं। 

    इसी साल 16 जनवरी को बसपा से निष्कासित पूर्व विधायक योगेश वर्मा अपनी पत्नी सुनीता वर्मा जो कि मेरठ की महापौर हैं, के साथ सपा में शामिल हुए। बरेली से बसपा के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह, मिर्जापुर से पूर्व विधायक श्रीराम भारती, राठ के पूर्व विधायक अनिल अहिरवार, बसपा सरकार में मंत्री रहे तिलक चंद अहिरवार, पूर्व विधान परिषद सदस्य महेश आर्या, पूर्व मंत्री राजेंद्र कुमार, पूर्व विधायक बब्बू खान, मुजफ्फरनगर से पूर्व विधायक अनिल जाटव, पूर्व सांसद दाउद अहमद, अलीगढ़ से कोल विधायक जमीरउल्लाह हाथी से उतर साइकिल पर सवार हो चुके हैं।

    वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा के तत्कालीन विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद ने पार्टी छोड़ दी थी। बाद में मौर्य भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके बाद बसपा के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता और पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक भी बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। वर्तमान में स्वामी प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक यूपी की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं बसपा का मुस्लिम चेहरा रहे नसीमद्दीन सिद्दीकी ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी। यूपी कांग्रेस ने हाल ही में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को संगठन के मीडिया सेल का चेयरमैन बनाया है।

    हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में सपा के साथ गठबंधन कर मौदान में उतरने वाली बसपा को संजीवनी मिली थी और शून्य से आगे बढ़ उसकी सीटें लोकसभा में दस तक पहुंच गयी थीं। जानकारों का कहना है कि बसपा के लिए खुद को फिर से खड़ा करने और यूपी में बड़ी ताकत बनने का वह सुनहरा मौका था पर माया के अनिश्चित रवैये और राजनैतिक अपरिपक्वता के चलते सपा-बसपा का गठबंधन जल्द ही टूट गया।

    गठबंधन के टूटने का जहां सबसे ज्यादा नुकसान मायावती को हुआ वहीं सपा फायदे में रही जिसके पाले में अधिकांश अल्पसंख्यक खड़े हो गए और दलितों के भी एक हिस्से में भी उसे सहानुभूति मिलनी शुरु हो गयी। कभी उपचुनाव न लड़ने वाली मायावती ने यूपी में हाल ही में संपन्न हुए सात सीटों पर उपचुनाव भी लड़ा और ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस से भी काफी पीछे रहते हुए जमानत तक गंवा दी।