घोषित कर्फ्यू से प्रशासन ने किया किनारा

हिंगनघाट. व्यापारियों के साथ चर्चा कर दस दिन का कर्फ्यू घोषीत किया गया़ परंतु इस घोषीत कर्फ्यू पर विवाद गहराते ही प्रशासन ने इससे अपना कीनारा कर लिया़. करोना संकट के चलते लॉकडाउन किया गया़ परिणामवश सड़क किनारे दुकान लगाकर कमानेवाले, रोजमजदूरी करने वालो पर भूखे मरने की नौबत आ गई़ इसके साथ छोटे बड़े सभी व्यावसायियों पर गंभीर संकट गहराया़ अंतत: सरकार ने अनलॉक की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें राहात पहुंचाई़.

लेकीन पिछले आठ-दस दिनों से शहर में लगातार कोराना बाधीतो की संख्या दिन ब दिन बढ़ने से प्रशासन ने लॉकडाउन को फिर से अमल में लाने का निर्णय लिया. लेकीन इस बार अधिकारियों ने व्यापारियों से चर्चा कर लॉकडाउन को अंमल में लाने का निर्णय लिया. परंतु इस पर विवाद होने से प्रशासन ने घोषीत कर्फ्यू से किनारा काट लिया.

व्यापारियों ने अपनी मर्जी से कर्फ्यू लगाया, ऐसी सफाई प्रशासन की और से दी गई. शहर के छोटे व्यापारियों के शिष्टमंडल ने फिर से कर्फ्यू लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की थी. इसपर प्रशासन ने अपनी बात रखते हुए कर्फ्यू हमारी तरफ से अंमल में नहीं लाने की बात की. इसी बात को लेकर सोशल मीडिया पर भी दस दिन के कर्फ्यू की बात वाइरल की गई, जो किसी सक्षम अधिकारी के आदेश पर नहीं था.

इसका पता चलते ही ऐसे भ्रामक पत्र को प्रसारित करने वाले पर कार्रवाई की मांग की गई. उक्त घटना से प्रशासन की लचर भूमिका उजागर हुई. इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे है. वें कौन व्यावसाई थे, जिनसे चर्चा कर प्रशासन ने कर्फ्यू को अमल में लाने की कोशिश की? यह सवाल भी किया जा रहा है.क्या प्रशासन कुछ बड़े व्यावसायियो के दबाव में इस तरह के निर्णय लेने लगा है? यह सवाल भी उठ रहा है.

हलाकि प्रशासन का निर्णय लोगो के स्वास्थ और सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है, इससे कोई इंकार नहीं करेगा. परंतु केंद्र और राज्य शासन की ओर से अनलॉक की प्रक्रिया जारी करने की सूचना के बावजूद लॉकडाउन करना वों भी कुछ बड़े व्यावसाई के दबाव में आकर, इससे प्रशासन की लचर व्यावस्था उजागर हो रही है. लॉकडाउन को वापिस लेने के लिये शहर के गुड्डू शर्मा, बाला मानकर, राहुल दारुणकर, निखिल इंजीनियर आदि सामाजिक कार्यकर्ताओ ने अधिकारियों से चर्चा की थी जिससे प्रशासन की ढुलमुल नीति के साथ कुछ व्यापारियों की दोगली नीति सामने आयी है़