जिले में पहली बार मिला फेरगीनस डक, पंछीप्रेमियों में हर्ष की लहर

वर्धा. जिले के वायफड गांव समीप तालाब पर पंछी निरीक्षण के दौरान पक्षी अभ्यासक राहुल वकारे को फेरगीनस डक का दर्शन हुआ. फेरनीगस डक को नयनसरी बत्तख भी कहा जाता है. वर्धा में पहली बार फेरगीनस डक का पंजीयन हुआ है. जिले में पाये जानेवाले स्थानीक व स्थलांतरीत संकट समीप प्रजातियों की सूची में नए नाम का पंजीयन होने से पंछी प्रेमियों में हर्ष की लहर है.

फेरुगीनस डक या फेरजिनस पोचर्ड नाम होनेवाले इस बत्तख को शास्त्रीय भाषा में अथ्या न्यरोका भी कहा जाता है. यह प्रजाति भारतीय उपखंड, आशिया, आफ्रिका व युरोप में स्थलांतर करते है. इस बत्तख की प्रजाति गीले प्रदेश में रहते है. दलदल की जगह, तालाब, मडफ्लैट, मछलियों का तालाब, किनारे पर आश्रयस्थानों में मिलते है. मध्यम आकार के बत्तख की लंबाई 35 से 40 सेमी व वजन 450 से 750 ग्राम होता है. नर व मादी दोनों की पीठ गहरे रंग की होती है. नर बत्तख की आंखे चमकीले व हल्के सफेद रंग की तथा मादी की आंखे ब्राऊन कलर की होती है. पेट व पंखे के नीचे का हिस्सा सफेद होता है.

बत्तख उडने के बाद उनके उपरी पंख पर दोनो तरफ सफेद पट्टी दिखायी देती है. सफेद पट्टी व चमकीली आंखे उनकी पहचान है. यह बत्तख सर्वभमी है. जलीय वनस्पति, अपृष्ठवंशी किटक, छोटे मछलिया का आहार करते है. विदर्भ में इससे पूर्व यवतमाल, अमरावती, नागपुर, चंद्रपुर, गोंदिया, वाशिम, अकोला जिले में इस पंछी का पंजीयन हुआ है. यह बत्तख बडे प्रमाण में झुंड में नही आते बल्कि, शेंडी बत्तख, छोटी लालसरी के साथ चुनिंदा संख्या में ही विदर्भ में आने की जानकारी पंछी अभ्यासक प्रवीण जोशी, नितीन मराठे, रुंदन काटकर, मिलींद सावदेकर ने दी.

वर्ष 2004 से विदर्भ में आगमन होकर राजु कसंबे, जयंत वडतकर, गजानन वाघ, प्रशांत निकम पाटील, सौरभ जवंजाल, किरण मोरे, रवि धोंगले, मंगेश तायडे, शिशिर शेंडोकर, शुभम गिरी, कन्हैया उदापुरे ने इन पंछियों का पंजीयन किया है. इस पंछी के अभ्यास के लिए वन्यजीव अभ्यासक पराग दांडगे, नितीन भोगल, श्रृष्टी भोगल व मानद वन्यजीव संरक्षक संजय इंगले तिगांवकर का सहकार्य मिला.