ओबीसी की फटकार, भाजपा को किया हद्दपार

– गजानन गावंडे

वर्धा. अति आत्मविश्वास, गलत प्रत्याशी का चयन, एक ही समाज को बार बार प्रतिनिधित्व व ओबीसी की एकता के कारण स्नातक चुनाव ने इस बार भाजपा को जोर का झटका दिया है. जिसकी कल्पना तक भाजपा ने नही की थी. अनेक वर्षो के उपरांत भाजपा का गढ नेस्तोनाबुत करने में कॉंग्रेस को सफलता मिली है. बिते अनेक वर्षे से नागपुर संभाग स्नातक निवार्चन क्षेत्र पर भाजपा का परचम लहराते आया है. अनेक बार कोशिश करने के उपरांत विरोधियों को औंधे मुंह की खानी पडी. परिणामवश विरोधी दल के नेता स्नातक चुनाव लडने से कतराते थे.

केंद्रिय मंत्री नितीन गडकरी, पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है. गत चुनाव में भाजपा ने नागपुर के महापौर अनिल सोले को मैदान में उतारा था. अपेक्षा के अनुसार सोले विजयी हुए. उन्हें पुन: अवसर मिलेगा ऐसे कयास लगाये जा रहे थे. किंतु टिकट बंटवारे को लेकर गडकरी व फडणवीस गुट आपस में भिडे. फडणवीस ने गडकरी पर मात देते हुए अपने निकटवर्तीय नागपुर के महापौर संदीप जोशी को टिकट दिलाया.

जोशी की जित के लिये फडणवीस ने स्वंय जोर लगाया. नागुपर क्षेत्र के भाजपा सांसद, विधायकों के साथ नेताओं पर जिम्मेदारी सौंपी गई. जगह-जगह बैठकों का आयोजन कर मतदाताओं को रिझाने का पुरा प्रयास किया गया. नगरसेवक से लेकर कार्यकर्ता व पदाधिकारियों ने मतदाता के घर पहुंचकर वोट मांगे. चुनाव के शुरूआती दौर में गडकरी गुट की नाराजी साफ झलक रही थी. किंतु बाद में गडकरी गुट भी तन से काम पर लग गया. एक और भाजपा पुरा जोर लगा रही थी. तो दुसरी और महाविकास आघाडी के नेता शांत रूप से प्रचार में जुटे थे.

चुनाव में हमेशा की तरह ब्राम्हण समाज का प्रत्याशी होने के कारण विरोधियों ने इस मुद्दे को पुरे जोर शोर से बढाया. साथ ही मुंढे प्रकरण को भुनाकर ओबीसी व अन्य समाज को एकत्रित करने की कोशिश शुरू की. दोनों मुद्दे मतदाताओं के मष्तिक में पहुंचाने का काम महाविकास आघाडी के नेताओं ने किया. जिससे यह चुनाव संघर्ष ब्राम्हण समाज विरूद्ध ओबीसी बनाम हुआ. कॉंग्रेस के अभिजीत वंजारी की स्थिति मजबूत होते देख गडकरी गुट ने कमर कस ली. जिसका नतिजा यह रहा की भाजपा का गढ पहिला बार ढह गया. भाजपा ने गत एक वर्ष से तैयारी आरंभ की थी. नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर वोटर बनाये, लेकीन ओबीसी मुद्दे पर यह वोटर भाजपा के हाथ से फिसल गये. जिसका अंदाजा भी भाजपा को नही लगा. भाजपा के नेता जित के संदर्भ में आश्वस्त थे. किंतु परिणामों ने भाजपा के होश उडा दिये है. यह पराजय भाजपा के लिये बडा आत्मचिंतन का सबक बन गया है. क्योकि, अपना मजबूत गढ भाजपा बचाने में नाकामयाब रही है.

राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के उपरांत एक-एक गढ को सुरंग लगाने का काम महाविकास आघाडी कर रही है. जिसमें स्नातक चुनाव वह सफल रही है. महाविकास आघाडी के नेताओं ने आपसी मनमुटाव भुलाकर पुरे ताकद से चुनाव लढने के कारण परिणाम उनके पक्ष में रहा है. आनेवाले दिनों में ग्रापं, नपं व नगर परिषद के बाद जिप, पंस के चुनाव होनेवाले है. ऐसे में महाविकास आघाडी को रोकने के लिये भाजपा को बडे प्रयास करने होंगे. नही तो स्थानीय स्वराज संस्था से भी भाजपा को बेदखल होने में समय नही लगेगा.