Representational Pic
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भंडारा. कोरोना संक्रमण का काल शुरु रहते समय भाईदूज से पूर्व विदर्भ की झाडीपट्टी में मंडई उत्सव का शुभारंभ हो गया है. कोरोना के कारण इस बार बहुत से लोग मंडई उत्सव का हिस्सा नहीं बने. झाडीपट्टी में लोककला का प्रदर्शन मंडई के माध्यम से किया जाता है. किसानों को भी अपनी फसलों के अनुरूप उत्सव में शिरकत करने का अवसर मिलता है.

अक्टूबर- नवंबर माह में खरीफ की फसल आती है. नई फसल के आने पर गांव-गांव में आनंदोत्सव मनाया जाता है. वर्ष भर खेत में रहने वाला किसान मंडई में अनेक तरह की खरीदी करता है. मंडई के मौके पर किसानों के दूर के रिश्तेदार, मित्र-मंडली आते हैं. उनके मनोरंजन के लिए नाटक. तमाशा, खड़ीगमंत, दंडार जैसी लोककला का आयोजन किया जाता है. झाडीपट्टी के तहत आयोजित किए जाने वाले दंडार को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में मंडई उत्सव की भूमिका बहुत अहम रही है.

उल्लेखनीय है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जब मनोरंजन का कोई साधन नहीं था, तब दंडार अस्तित्व में आया. रेडियो, टीवी, सिनेमाघर जैसे मनोरंजन के साधन आने के बाद लोककला और उससे जुड़े आयोजन धीरे-धीरे कम होने लगे और मंडई जैसे उत्सव के प्रति आकर्षण भी कम हो गया. मंडई उत्सव में रिश्तेदारों के घर जाकर रहने की परंपरा का पालन आज भी भंडारा जिले के अंतर्गत आने वाले अधिकांश गांवों में हो रहा है.

कई स्थानों पर तो मंडई उत्सव रिश्ते जोड़ने का साधन भी बन रहा है. बदलते दौर में इस उत्सव का स्वरुप बदलता जा रहा है और इस उत्सव ने लघु रूप धारण कर लिया है. जो कलाकार इससे जुड़े हैं, वे चाहते हैं कि यह कला जीवित रहे, जिससे अगली पीढ़ी को भी इस उत्सव के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त हो.