भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक आशाजनक युग की शुरुआत : पुनीत रेन्जेन

  • कमला हैरिस का उपराष्ट्रपति बनना भारत के हित में

मुंबई. प्रमुख ऑडिट और वित्तीय सलाह सेवा प्रदाता कंपनी डेलॉइट ग्लोबल (Deloitte Global) के सीईओ पुनीत रेन्जेन ने कहा है कि भारतीय मूल की कमला हैरिस (Kamala Harris) के अमेरिका के उपराष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित होने से भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक आशाजनक युग की शुरुआत होगी. वास्तव में यह दुनिया भर के भारतीयों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. हमारे बीच में से एक तमिलनाडु की मूल निवासी को अमेरिका में दूसरे सबसे बड़े पद के लिए निर्वाचित किया गया है.

भारत के साथ-साथ प्रवासी भारतीयों के बीच अमेरिका की नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने इतिहास रच दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी सफलता को “अभूतपूर्व” बताया और कहा कि यह सभी भारतीय-अमेरिकियों के लिए भी बहुत गर्व की बात है. उनकी बात बिल्कुल सही है और उनके वक्तव्य का दूसरा भाग, “मुझे पूरा विश्वास है कि आपके समर्थन और नेतृत्व से जीवंत भारत-अमेरिका संबंधों में और ज्यादा मजबूती आएगी”, भी संभवतः एकदम सटीक साबित होगा. इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि उपराष्ट्रपति के तौर पर कौन निर्वाचित हुई हैं बल्कि वह और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन जिन बातों के लिए प्रतिबद्ध हैं, वह भी इसकी एक बड़ी वजह है.

राष्ट्रपति जो बाइडेन भी भारत के समर्थक

भारत-अमेरिकी उद्यमी पुनीत रेन्जेन (Punit Renjen) ने कहा कि नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) ने अपने पूरे करियर के दौरान भारतीय-अमेरिकी संबंधों का समर्थन किया है. वर्ष 2006 में उन्होंने कहा था कि “मेरा सपना है कि वर्ष 2020 में भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे करीबी देश होंगे.” जनवरी के महीने में पदभार संभालने के बाद, उनके पास अपने इस सपने को साकार करने का बेहतरीन अवसर होगा. बाइडेन और हैरिस पहले ही कुछ ऐसे तरीकों की रूपरेखा तैयार कर चुके हैं जिसके आधार पर उनके प्रशासन ने भारत के साथ सहयोग करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है, ताकि दोनों देशों के लिए और बड़े पैमाने पर पूरी दुनिया के लिए वर्तमान के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित किया जा सके.

जलवायु परिवर्तन सबसे प्रमुख मुद्दा

जलवायु इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा है. राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में, बाइडेन ने अपने प्रशासन को भरोसा दिलाया कि कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे से गंभीरता से निपटा जाएगा. उन्होंने वर्ष 2050 तक अमेरिका को 100% स्वच्छ ऊर्जा वाली अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में शीघ्र कार्रवाई करने तथा दुनिया के दूसरे देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करने की शपथ ली है. इस प्रकार की वचनबद्धता का लाभ भारत को भी मिलेगा, क्योंकि इस क्षेत्र में अमेरिका और भारतीय उपमहाद्वीप के सामने मौजूद चुनौतियां एक-समान हैं.

पुनीत रेन्जेन ने कहा कि मैं हिमाचल प्रदेश में एक बोर्डिंग स्कूल का छात्र था और मुझे आज भी याद है कि मैं अपनी कक्षा की खिड़कियों से हिमालय के शानदार नजारे को देखा करता था. लेकिन बीते दशकों में वायु प्रदूषण की वजह से अब वहां से हिमालय धुंधला दिखाई पड़ता है. इसके अलावा, हर साल देश भर में गर्मी की लहरों के साथ-साथ बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को अपनाता भारत

भारत ने जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए पहले से ही अपने स्तर पर प्रयास करना आरंभ कर दिया है और ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को अपनाया है, जिसमें पांच साल पहले वैश्विक गठबंधन की स्थापना भी शामिल है. अब नए अमेरिकी राष्ट्रपति के सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण के साथ-साथ यू.एन. ग्लोबल कॉम्पेक्ट से जुड़ने वाले डेलॉइट ग्लोबल जैसे वैश्विक संगठन तथा पूरी तरह-शून्य उत्सर्जन को प्राप्त करने एवं ESG रिपोर्टिंग में सुधार करने की दिशा में हमारी अपनी प्रतिबद्धताओं के कारण भारत और अमेरिका के लिए एकजुट होकर अपनी धरती को बेहतर बनाने का सुनहरा मौका है. दोनों देश साथ मिलकर फंडिंग, अनुसंधान और विकास के प्रयासों में सहयोग कर सकते हैं जो स्वच्छ, पहले से ज्यादा हरे-भरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाने के लिए बेहद आवश्यक है.

स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण मसला

स्वास्थ्य भी इसी प्रकार का एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है. फिलहाल, भारत और अमेरिका कोरोनावायरस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और दोनों देशों में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद निराशाजनक है. नई दिल्ली से न्यूयॉर्क शहर तक, कोविड-19 का प्रभाव बेहद विनाशकारी रहा है. इससे यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि दुनिया के सभी देशों की सीमाओं को पार करने वाले एक वायरस का मुकाबला करने के लिए हमें भी अभूतपूर्व स्तर पर इस प्रकार के चिकित्सा और वैज्ञानिक सहयोग की आवश्यकता है, जो देश की सीमाओं से परे हो.

नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बाइडेन इससे पूरी तरह सहमत हैं. इस महामारी का सामना करने के लिए एक वैक्सीन के विकास, निर्माण तथा बड़े पैमाने पर एवं समान रूप से वितरण के लिए सहभागितापूर्ण वैश्विक प्रयासों का समर्थन करके आगामी बाइडेन सरकार ने इस दिशा में उम्मीद की किरण सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं बल्कि भारत के लिए भी जगाई है, क्योंकि संयुक्त मोर्चे पर बहुपक्षीय सहयोग ही इस महामारी से निपटने का एकमात्र संभावित तरीका है.

भारत में बढ़ेगा निवेश, चमकेगी अर्थव्यवस्था

पुनीत रेन्जेन ने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था भी एक प्रमुख मुद्दा है. वास्तव में H1B वीजा की प्रकिया मे सुधार और STEM क्षेत्रों में PhDs के लिए ग्रीन कार्ड पर नियंत्रण को पूरी तरह हटाने, दुनिया भर में हरित ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में निवेश तथा भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में मान्यता देने के संदर्भ में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बाइडेन ने जिन नीतियों का प्रस्ताव दिया है, उससे निश्चित तौर पर भारत को लाभ होगा. अमेरिका तथा अन्य देशों के CEOs भारत के भविष्य के बारे में हमारी धारणा को लेकर लगभग एकमत हैं और वे सभी भारत के लोगों, यहां की उत्पादक क्षमताओं और यहां की संभावनाओं में निवेश करने के लिए बेहद उत्साहित हैं.

भारत में खाद्य प्रसंस्करण, दवा निर्माण, रक्षा, वस्त्र निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में बड़ी एवं दीर्घकालीन संभावनाएं मौजूद हैं और इन क्षेत्रों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) से सही मायने में रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे तथा मौजूदा परिस्थितियों में बदलाव आएगा. भारत की अर्थव्यवस्था में नई जान डालने और इसके सहारे सफलता की राह पर आगे बढ़ने के लिए यह भारतीय नीति-निर्माताओं तथा व्यापारिक नेतृत्वकर्ताओं के लिए एक सुनहरा अवसर है. वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के प्रभाव को देखते हुए यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि सिर्फ बदलाव आवश्यक नहीं है, बल्कि जल्द-से-जल्द परिवर्तन भी बेहद जरूरी है.

महामारी के दौरान कृषि और श्रम में सुधार के लिए पारित किए गए नए कानून, समय की मांग बन चुके हैं और यह इस दिशा में उठाया गया पहला सराहनीय कदम है. इस तरह भारत के पास बेहतरीन मौका है कि वह इसी राह पर आगे बढ़ते हुए और सहयोगपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बाइडेन प्रशासन की प्रतिबद्धता का लाभ उठाते हुए अपना उत्थान कर सके. हमें पूरा विश्वास है कि भारत-अमेरिका का संबंध कामयाबी की नई बुलंदियों तक पहुंचेगा और इसका लाभ हमारे पर्यावरण, हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा.