निजी बैंकों पर कड़ी निगरानी आवश्यक

यस बैंक प्रकरण से यह बात साफ हो गई है कि भारत का वित्तीय क्षेत्र कमजोर व असुरक्षित है. रिजर्व बैंक की कड़ी निगरानी नहीं रहने से ऐसे मामले पनपते हैं. निजी क्षेत्र के बैंक जब डूबने लगते हैं तो सबसे

यस बैंक प्रकरण से यह बात साफ हो गई है कि भारत का वित्तीय क्षेत्र कमजोर व असुरक्षित है. रिजर्व बैंक की कड़ी निगरानी नहीं रहने से ऐसे मामले पनपते हैं. निजी क्षेत्र के बैंक जब डूबने लगते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान देश के करदाताओं का होता है. यस बैंक को संकट से उबारने के लिए स्टेट बैंक आफ इंडिया सामने आया. एक विफल हो चुके निजी बैंक को बचाने के लिए यह जनसंसाधनों का अप्रत्यक्ष इस्तेमाल है. यह जरूरी भी हो गया था क्योंकि वित्तीय प्रणाली के प्रति विश्वास कायम रखने और अर्थव्यवस्था को और अधिक नुकसान से बचाने के लिए ऐसा करना पड़ा. यस बैंक के पास 3 लाख करोड़ के संसाधनों का आधार है जिसमें से 2 लाख करोड़ रुपए तो जमाकर्ताओं के ही हैं. पिछले 2 वर्षों से नजर आ रहा था कि यस बैंक की हालत गड़बड़ है. रिजर्व बैंक ने डूबत कर्ज (बैड लोन) को लेकर उसकी खिंचाई की थी. 2018 में ऐसी नौबत आई कि बैंक के संस्थापक व पूर्व सीईओ राणा कपूर को हटना पड़ा. बैंक के गवर्निंग बोर्ड को रिजर्व बैंक द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि को रखना पड़ा. यस बैंक के अकाउंट वास्तविकता को छुपा रहे थे. उसने 2019-20 की जुलाई-सितंबर तिमाही में शुद्ध लाभ दिखाया था. बैंक की बिगड़ती आर्थिक स्थिति तथा पूंजी निवेश की कोई विश्वसनीय योजना नहीं होने की वजह से यह बंधन लगाना जरूरी हो गया कि कोई भी खातेदार प्रतिमाह 50,000 रुपए से ज्यादा की रकम नहीं निकाल सकता. इससे ग्राहकों को दिक्कतें जा रही हैं. दूसरी ओर बिगड़ी हालत को संभालने के लिए स्टेट बैंक को अनुमति मिली है कि वह यस बैंक में 49 प्रतिशत भागीदारी रखे जो अगले 3 वर्षों में 26 प्रतिशत से नीचे नहीं जाएगी. इस कदम के फलस्वरूप यस बैंक में तत्काल 2,450 करोड़ रुपए आएंगे. होना तो यह चाहिए कि निजी बैंकों की अनियमितता व संदिग्ध लेनदेन पर पहले से रिजर्व बैंक की कड़ी निगाह होनी चाहिए. यदि ऐसा हो तो इस प्रकार की त्रासदी से बचा जा सकता है. प्रवर्तन निदेशालय ने 600 करोड़ रुपए से ज्यादा रिश्वत (किकबैक) लेने व आपराधिक साजिश के मामले में राणा कपूर को गिरफ्तार किया है. उनकी 2,000 करोड़ की संपत्ति पर ईडी की नजर है.