Gondia Temple, Makar Sankranti

  • ग्राम गराडा के किनारे उमड़ते है श्रद्धालु

बिरसी फाटा (तिरोड़ा). काशीघाट तिरोड़ा से 2 किमी दूर तीर्थक्षेत्र स्थापित है. जिसे संत सोनबाजी महाराज की तपोभूमि के नाम से जाना जाता है. बोदलकासा जलाशय से उगम हुए गराडा ग्राम के नाले के किनारे स्थित है. हर वर्ष मकर संक्रांति पर भव्य मेले का आयोजन भी होता है. इस वर्ष भी 14 जनवरी से 7 दिनों तक यहां मेला लगने वाला है. मेले में परिसर के ही नहीं दूरदराज से भक्त बड़ी संख्या में पहुंचकर पूजा-पाठ कर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं.

काशी विश्वनाथ की पूजा-अर्चना बरसों पहले से भगवान शंकर अर्थात काशी विश्वनाथ की पूजा-अर्चना की जाती थी. एक झरना है जो वर्ष भर निरंतर प्रवाहित रहता है. धार्मिक आस्था के अनुसार भूमिगत झरना काशी विश्वनाथ की कृपा से निरंतर बहता तथा स्वयं भगवान काशी विश्वनाथ विराजित हैं. ऐसी मान्यता दीर्घ काल से स्थापित है. निरंतर बहने वाले झरने का काशी माता के नाम से भी जाना जाता है. इस स्थान पर आने-जाने के रास्ते पर घाट होने से इसकी पहचान काशीघाट रूप में स्थापित हो गई.

ग्रामीणों की मदद से किया गया कुंड का निर्माण

गराडा, चुरडी, चिखली ,खैरबोडी के ग्रामीणों की मदद से निरंतर बहने वाले झरने की जगह पर कुंड का निर्माण किया जो आज भी स्थापित है. वहीं पर शिवलिंग की स्थापना कर पूजा अर्चना की गई. वर्ष 1955 में संत सोनबाजी महाराज की ओर से खेत में स्थापित हनुमान की मूर्ति की काशीघाट में पीपल के पेड़ के पास स्थापना की गई. उस समय भी काशीघाट देवस्थान में मकर संक्रांति, कार्तिक पूर्णिमा व शिवरात्रि पर्व पर पूजा की जाती थी. सोनबाजी महाराज को संत के रूप मे जाना जाने लगा. सन 1964 के चैत्र शुद्ध व चतुर्दशी अर्थात हनुमान जयंती पर्व पर सोनबाजी महाराज ने  प्राण त्यागे. भक्ति भाव द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ उनकी समाधि का निर्माण इसी स्थान पर किया गया. 

सन 1968 में कार्तिक पूर्णिमा के दूसरे दिन से तिरोडा के टीकाराम बावनकर (टीटू) महाराज उर्फ स्वामी तन्मयानंद महाराज ने साधना कर 41 दिन का अनुष्ठान पूर्ण किया, तभी से मकर संक्रांति पर 7 दिन का मेला लगता है. जानकारों के अनुसार यहां आकर पूजा करने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है.