भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी, जानें शुभ मूहुर्त, महत्व और पूजा विधि

    -सीमा कुमारी

    सनातन हिंदू धर्म के अनुसार, हर महीने दो चतुर्थी आती है। एक शुक्ल पक्ष में, और दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस महीने 31 मार्च, बुधवार को ‘भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी’ है। ‘भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी’ के दिन विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है।

    इस दिन लोग बुद्धि और शुभता के देव भगवान श्रीगणेश का व्रत और पूजन करते हैं। कहा जाता है इस विशेष दिन नियम और निष्ठा के साथ भगवान गणराया की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के कार्यों में आने वाले विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं।

    आईए जानें ‘संकष्टी चतुर्थी’ का शुभ मूहुर्त, महत्व और पूजा विधि।

    * शुभ मूहुर्त:

    चतुर्थी तिथि आरंभ-

    31 मार्च 2021 दिन बुधवार दोपहर 02 बजकर 06 मिनट से

    चतुर्थी तिथि समाप्त-

    01 मार्च 2021 दिन बृहस्पतिवार सुबह  10 बजकर 59 मिनट पर

     * पूजा विधि:

    ‘भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी’ के दिन सुबह उठकर स्नानादि करने के बाद स्वच्छ एवं साफ वस्त्र धारण करें।

    भगवान श्रीगणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान श्रीगणेश के सामने धूप-दीप प्रज्वलित करें। गणेशजी को पुष्प, अक्षत, पंचामृत और दूर्वा अर्पित करें। श्रीगणेश को बूंदी के लड्डू या मोदक का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान गणे की आरती करें और संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ें।पूरे दिन व्रत उपवास करने के बाद रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत तोड़ें।

    * महत्व:

    हिन्दू मान्यता के अनुसार, ‘संकष्टी चतुर्थी’ का व्रत कृष्ण पक्ष चतुर्थी के दिन रखा जाता है। भालचंद्र का व्रत गणेश भक्तों के लिए बहुत ही शुभ एवं फलदायिनी माना जाता है। क्योंकि चतुर्थी तिथि भगवान गणेश की प्रिय तिथि है।

    सनातन धर्म में श्री गणेश जी को प्रथम देव माना गया है। ऐसे में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले श्री गणेश जी का नाम लिया जाता है। मान्यता तो ये भी है कि जो व्यक्ति इस दिन निर्मल हृदय से व्रत करता है, पूजा-अर्चना करता है, उसके सभी दु:ख खत्म हो जाते हैं।

    यही कारण है कि भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। भगवान गणेश अपने सच्चे भक्तों के दुखों को हर लेते हैं।