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    • आम आदमी हो रहा हलाकान

    नागपुर. सरकार निर्णय लेती है जिसके अनुसार लोग काम करते हैं. लेकिन इस बदलाव के बीच लोग बुरी तरह फंस जाते हैं. पहले नागपुर सुधार प्रन्यास (एनआईटी) को भंग किया गया. आम जनता और बिल्डरों ने नियमानुसार महानगरपालिका के पास प्लान मंजूरी के लिए आवेदन किए और मंजूरी हासिल की लेकिन बाद में सरकार ने एनआईटी को बहाल कर दिया. अब एनआईटी मनपा द्वारा मंजूर प्लान को मानने से इनकार कर रहा है.

    मनपा अधिकारी पुन: एनआईटी से मंजूरी लेने को कह रहे हैं. बिल्डरों ने मनपा के पास कम से कम 20-25 करोड़ रुपये भरे हैं, वह पैसा मनपा से एनआईटी को नहीं भेजा जा रहा है, जबकि पैसे पर एनआईटी अपना दावा कर रहा है. इस खेल में विकास पिछड़ रहा है. प्रोजेक्ट रुक गए हैं और सिटी में नया निर्माण कार्य आपसी तालमेल के अभाव में बाधित होने लगा है. 

    इस मुद्दे को महानगरपालिका और एनआईटी के अधिकारी आपस में बैठकर सुलझा सकते थे लेकिन उनके पास  इसके लिए टाइम नहीं है. वे एक दूसरे पर आरोप मढ़ने का ही काम कर रहे हैं. मामला लंबा खिंच रहा है. मंजूर हो चुके प्लान पर भी काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है क्योंकि मनपा द्वारा मंजूर फाइल एनआईटी मान्य नहीं कर रही है. इतना ही नहीं, एनआईटी को पूरा पैसा भी चाहिए. पैसा मनपा ले चुकी है. बिल्डर कभी इधर तो कभी उधर चक्कर काटने को मजबूर हैं. अपील कर रहे हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है.

    100-150 प्रोजेक्ट अटके

    किसी भी क्षेत्र में प्रोजेक्ट आने से क्षेत्र का विकास होता है लेकिन मनपा और एनआईटी की कार्यशैली से कम से कम 100 से 150 प्रोजेक्ट अटक गए हैं. इन प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाने के लिए बिल्डर कम से कम 20 से 25 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर चुके हैं. अब यह पैसा मनपा द्वारा एनआईटी को ट्रांसफर नहीं किया जा रहा है. पैसा ट्रांसफर नहीं होने से एनआईटी फाइल को आगे नहीं बढ़ा रहा है. बिल्डर, आम जनता अपने-अपने प्रोजेक्ट को लेकर भटकने को मजबूर है. 

    प्रोजेक्ट पड़े ठप 

    बिल्डर इसे लेकर खासे परेशान हो रहे हैं क्योंकि लाखों करोड़ रुपये का भुगतान करने के बाद भी प्रोजेक्ट चालू नहीं हो पा रहे हैं. प्रोजेक्ट में विलंब होता है तो कई प्रकार के खर्चों में बढ़ोतरी होने लगती है जिसका सीधा सीधा असर लागत पर पड़ने लगता है. इसके लिए किसी न किसी को जिम्मेदारी लेनी चाहिए. यह किसी बिल्डर या मंजूरी लेने वालों के लिए नहीं बल्कि सिटी के विकास के लिए बहुत जरूरी है. आज लाखों करोड़ रुपये भरने वाले भी भटकने को मजबूर हो रहे हैं. आखिर हम अपेक्षा करें तो किससे.- गौरव अग्रवाला सचिव, क्रेडाई 

    लेनी होगी जिम्मेदारी

    मनपा हो या फिर एनआईटी. दोनों ही संस्थाएं विकास को आगे ले जाने के लिए जिम्मेदार हैं. ऐेसे में किसी न किसी अधिकारी को आगे आकर समस्याओं का हल निकालना चाहिए. आज पैसा भी हम भर रहे हैं और समस्याएं भी हम झेल रहे हैं. कोई बिल्डर 50 लाख भरता है तो कोई करोड़, 2 करोड़ का भुगतान केवल प्लान मंजूर कराने के लिए भरता है. सुविधाओं की बात तो होती नहीं, परेशानी बढ़ा दी जाती है. – राजेंद्र आठवले, पूर्व अध्यक्ष, बिल्डर एसो. ऑफ इंडिया, महाराष्ट्र

    सिस्टम में हो सुधार

    विकास के लिए समन्वय की सख्त जरूरत है. आज 2 संस्थाओं में समन्वय कम होने से सभी लोग परेशान हो रहे हैं. महीनों तक प्रोजेक्ट लेट हो रहे हैं. इससे बिल्डर पर आर्थिक भार बढ़ाता है. बिल्डर पर आर्थिक भार बढ़ने का सीधा असर ग्राहकों पर होता है. इससे लागत बढ़ती जाती है. लोग अपने सपने को साकार नहीं कर पाते हैं. बेहतर होगा कि समयबद्ध तरीके से प्लान मंजूर किया जाए और जो वर्तमान समस्याएं हैं उनका निदान जल्द से जल्द किया जाए.- सागर रतन, ग्रामीण बिल्डर एसो.