How much trust is possible on the Congress leadership

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आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन पर कांग्रेस अपना नेतृत्व चाहती है जबकि अन्य विपक्षी पार्टियों की अलग राय बनी हुई है. कांग्रेस का ऐसा सोचना इसलिए तर्कसंगत है क्योंकि वह राष्ट्रीय पार्टी होने के अलावा देश के तमाम राज्यों के जिलों और गांवों में उसके कार्यकर्ता हैं. उसकी यह मौजूदगी उसे अन्य क्षेत्रीय पार्टियों से अलग करती है जिनका सिर्फ अपने राज्य में आधार है. संसद में सदस्य संख्या के लिहाज से भी अन्य विपक्षी पार्टियों की तुलना में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद ज्यादा है. इसलिए वह विपक्ष की अगुआई करना चाहती है.

कांग्रेस यह भी जानती है कि यदि विपक्ष ने उसे छोड़कर कोई तीसरा मोर्चा बनाया तो उसे कामयाबी नहीं मिल पाएगी. पहले भी कांग्रेस और बीजेपी से समान दूरी रखकर बनाए गए तीसरे मोर्चे का क्या हश्र हुआ था, यह सबके सामने है. विपक्ष के कितने ही नेता अपने को अधिक अनुभवी व सीनियर मानते हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने के लिए पूरी तरह अनिच्छुक हैं. यद्यपि फिलहाल राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की अपने दम पर सरकार है तथा झारखंड की सरकार में वह शामिल है फिर भी अन्य विपक्ष शासित राज्यों में क्षेत्रीय दलों की तुलना में कांग्रेस कमजोर स्थिति में है. यही वजह है कि केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, के. चंद्रशेखर राव जैसे नेता विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के खिलाफ हैं. वे यह जरूर चाहते हैं कि कांग्रेस विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बने.

रायपुर में कांग्रेस के महाधिवेशन में कुछ प्रमुख पार्टी नेताओं ने एक बैठक में अलग से इस मुद्दे पर मंथन किया गया कि बीजेपी के खिलाफ मजबूत गठबंधन बनाने के लिए ममता बनर्जी, केजरीवाल और टी चंद्रशेखर राव की पार्टियों तथा पुराने जनता दल परिवार को साथ जोड़ा जाए. कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की समिति के प्रमुख वीरप्पा मोइली को यह जिम्मेदारी दी गई है.

KCR की अलग ढफली नीतीश भी देख रहे सपने

क्षेत्रीय पार्टियों के महत्वाकांक्षी नेता बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी मोर्चा बनाने के लिए आपस में समन्वय साधने में लगे हैं. बीजेपी विरोधी जी-8 कहे जानेवाले इस मोर्चे में 7 गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री शामिल होंगे. इस मोर्चे में ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन, अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, के. चंद्रशेखर राव और तेजस्वी यादव को शामिल करने के प्रयास चल रहे हैं. केसीआर ने अपनी मूल पार्टी टीआरएस का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) कर लिया और पटना जाकर नीतीशकुमार से मिले थे. उधर नीतीशकुमार भी अपनी ‘सुशासन बाबू’ की छवि के साथ प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं.

उन्होंने तेजस्वी यादव को अपनी जगह सीएम बनाने का इरादा भी दर्शाया है. यह संकेत है कि वे 2024 में केंद्र की राजनीति में उतरना चाहते हैं. इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस को अलग रखकर कोई विपक्षी मोर्चा बना, ज्यादा समय टिक नहीं पाया. कांग्रेस बाहरी समर्थन देकर यदि सरकार बनाती है तो कुछ माह बाद समर्थन वापस लेकर उसे गिरा भी देती है. चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर की सरकारों का यही हश्र हुआ था. कांग्रेस के दबाव की वजह से ही देवगौड़ा को हटाकर गुजराल को पीएम बनाया गया था.