इस वर्ष आंबोली में नही होगा गुरूदेव भक्तों का मेला- 61 वर्ष पुरानी परम्परा खंडीत

भिसी. राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने वर्ष 1959 में आंबोली चौरस्ता में गुरुदेव सप्ताह का आयोजन किया था. तब से लगातार पिछले वर्ष तक आंबोली चौरस्ता में अखंड रुप से आयोजित गुरूदेव सप्ताह इस वर्ष कोरोना के चलते रद्द कर दिया है. कोरोना संक्रमण के चलते पिछले 60 वर्ष पुरानी परम्परा इस वर्ष खंडीत होने से गुरुदेव भक्तों मे मायुसी छायी है. 

चिमूर तहसील को राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की कर्मभूमी के रूप में माना जाता है. भारत देश को स्वतंत्रता मिलने से पूर्व से लगाकर देश स्वतंत्र होने के बाद अनेक वर्षो तक राष्ट्रसंत ने चिमूर तथा आसपास के इलाके मे रहकर इस भूमी को पावन किया था. अंग्रेजों की सत्ता में राष्ट्रसंत क्रांतीकारी भजनों से जनता में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने कि प्रेरना दि थी. 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के बाद भी राष्ट्रसंत ने अपने भजनो से समाज मे फैली अंधश्रध्दा, व्यसनमुक्ति, लोकतंत्र, बालविवाह जैसी कुप्रथाओ पर कडा प्रहार कर समाज में जनजागृती करने का कार्य जारी रखा. 

ऐसे ही एक समय शंकरपूर से शिरपूर जाते समय तत्कालिन जिला परीषद सदस्य रामराव पाटील तथा आंबोली के बापुराव ठाकरे के यहां रूके. एक बार शिरपूर से आंबोली जाते समय जंगल में एक स्थान पर कुछ अजीब सा महसुस हुआ. थोडी देर बाद यह स्थान ऋषिमुनीओं स्थान होने कि अनुभुती महाराज को आयी. तत्पश्चात अपने साथीओं व्दारा उस स्थान पर साफसफाई कर ध्वजारोहन किया. हर वर्ष इस स्थान पर गोपाल काला करने का आदेश देकर गुरूदेव सप्ताह मनाया जाने कि घोषना की. 1959 से लगातार तिन वर्ष राष्ट्रसंत ने स्वयं उपस्थित रहकर गुरूदेव सप्ताह का आयोजन किया.

दिन ब दिन वहां गुरूदेव भक्तों का मेला लगने लगा. पीने के पानी की समस्या पर महाराज द्वारा दर्शायी गयी जगह पर कुआं खोदा गया. जिससे आज भी गुरूदेव भक्त तथा राहगीर अपनी प्यास बुझाते है. आगे तत्कालीन जिला परीषद सदस्य शामराव पाटील ने अपने निधी से उस परीसर में प्रार्थना ओटा बनवाया.

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की उपस्थिति में  1959 से 1961 तक गुरूदेव सप्ताह तथा गोपाल काला का आयोजन किया था. 1968 में वंदनीय राष्ट्रसंत का निधन हो गया. राष्ट्रसंत की स्मृती में अनुयायी आंबोली के बापूराव ठाकरे ने राष्ट्रसंत का पांच फूट उंचा मावनाकृती पुतले का निर्माण किया. यहां एक समिति का गठन कर हर वर्ष गोपाल काला का आयोजन किया जाता है.

पिछले 5 से 6 वर्ष से दिसम्बर की 28 तारीख को इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. परंतु इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते धार्मीक, सामाजीक उत्सवों पर प्रतीबंध लगाने कि वजह से यहां पिछले 61 वर्ष से अंखड शुरू परंपरा खंडीत होने से गुरूदेव भक्तों मे मायुसी छाई है.