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    गोंदिया. जिले में हो रही सतत बारिश व बदरीले वातावरण का सीधा असर धान की फसल पर पड रहा है. इतना ही नहीं धान की फसल पर तुडतुडा रोग का प्रकोप बढ गया है. इस पर किसानों को समय पर उपाय योजना करना जरूरी है.  हरा, नारंगी व सफेद इस प्रकार तुडतुडा के अलग अलग प्रकार है. जिसमें हरा तुडतुडा पानी से रस शोख लेता है और धान पिला पड जाता है, नारंगी तुडतुडा प्रौढ होने से पेड की जड से सतत रस चुस लेते है जिससे पत्ते पिले होकर सुखने लगते है.

    वहीं सफेद तुडतुडे का बडे पैमाने पर प्रभाव होता है, उससे धान के बाहरी पत्ते क्षीण होते दिखाई देते है, इस पर प्रतिबंधात्मक उपाय समय पर करना जरूरी है. ऐसा नहीं होने पर उत्पादन में कमी आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. भारी प्रजाति वाल धान विभिन्न रोग व हलके प्रजाति के धान सतत बारिश से खतरे में आ रहे है. इस वर्ष शुरूआत में दो महीने खंडित बारिश हुई. इसके बाद सतत हो रही बारिश से वातावरण में बडा परिणाम हुआ है. इसी में अनेक प्रकार के रोग सहित तुडतुडा का प्रभाव बढ गया है.

    इसके लिए किसानों को सबसे पहले बंधियों में जमा पानी निकालकर सुबह के समय धुप के पूर्व छिडकाव करने व इसके बाद धान के निचे सुक्ष्म निरीक्षण कर 5 से 10 तुडतुडे पाए जाने पर स्तर बढा है क्या? यह समझने के लिए पहले मटरायझिंग अॅनिसोप जैविक फंगल विरोधी एक किलो प्रति एकड इस अनुपात में उपयोग कर छिडकाव करना चाहिए. रासायनिक सिफारिश के अनुसार तुडतुडा नियंत्रण के लिए इंमिडाक्लोरिड 17.8 एसएल 2.2 मिली या ट्रायझोफास 40 एलजी प्रवाही 20 मिली 10 लीटर पानी में मिलकार छिडकाव कराना चाहिए और ध्यान रखा चाहिए कि वह धान के जड तक पहुंच सके.