मेलघाट: मंत्री-राज्यमंत्री के गृहजिले से कब मिटेगा कुपोषण का अभिशाप

देश-दुनिया में जहां कोरोना ने बेरोजगारी बढ़ा दी है. एसे में मेलघाट कहां अछूता रह सकता है. रोजगार की तलाश में विभिन्न प्रांतों में पलायन करने वाले लौट आने के बाद फिर रोजगार की खोज में निकल पड़े है. रोजगार गारंटी योजना भी रोक नहीं पाई. रोजगार के स्थायी प्रबंधों को लेकर शासन से स्थानीय कृषि उपज पर आधारित प्रक्रिया केंद्र के साथ ही वनौषधि निर्माण की दिशा में कल-कारखानों का सृजन करने दबाव बनाया जा सकता है. तभी कुपोषण का अभिशाप दूर हो सकता है.

  • बाल व माता मृत्यु में बढ़ोतरी

अमरावती. इक्कीसवीं सदी में प्रगतिशील महाराष्ट्र के प्रमुख आदिवासी बहुल क्षेत्र मेलघाट में आज भी भुखमरी है. बेरोजगारी ही यहां की सबसे प्रमुख समस्या रही है और आज भी कायम है. आए दिन बालमृत्यु और माता मृत्यु का सिलसिला थमा नहीं है. हालांकि जिला स्वास्थ्य प्रशासन लाख दावे कर ले कि कुपोषण कम हो गया है, लेकिन बाल मौतों की संख्या वास्तविकता छिपा नहीं सकती है. 

मंत्री-राज्यमंत्री से उम्मीदें 

चिंतनीय बात यह है कि अब राज्य की महिला व बाल विकास मंत्री एड. यशोमति ठाकुर व राज्यमंत्री बच्चू कडू भी इसी जिले से है. जिसके कारण मेलघाट पर बरसों से लगा कुपोषण व बाल मृत्यु-माता मृत्यु पर रोक लगाने के सार्थक प्रयास जरूरी है. इस बीच सामाजिक संस्थाओं (एनजीओ) के माध्यम से मेलघाट में कुपोषण की रोकथाम के लिये वर्षों से चलाई जा रही नवसंजीवनी योजना की थाह लेने की भी आवश्यकता है. इसी क्रम में सीईओ अमोल येडगे ने मेलगाट में शासकीय योजनाएं अमल में लाने के लिये कार्यरत एनजीओ का आडिट करने का निर्णय लिया है.  

एक माह में 17 बाल मौतें 

शुक्रवार 6 नवंबर को जिला परिषद की स्थायी समिति सभा में सदस्यों द्वारा यह मुद्दा उपस्थित किए जाने पर खुद जिला स्वास्थ्य अधिकारी (डीएचओ) डा. दिलीप रणमले ने स्वीकारा कि मेलघाट में अक्टूबर-नवंबर में सर्वाधिक 17 बाल मौतें हुई हैं. धारणी तहसील के साद्राबाड़ी, बैरागड़ व कलमखार स्वास्थ्य केंद्रों के अंतर्गत यह बाल मौतें दर्ज की गई है. वजन कम (प्री-मैच्यूर) होने से यह मौतें होने का कारण भी उन्होंने सभा में स्पष्ट किया.   

डक्टरों की कमी से जूझ रहा स्वास्थ्य विभाग 

 तीन दशकों से कुपोषण का अभिशाप झेल रहे मेलघाट में डाक्टरों के कई पद रिक्त है और सरकार केवल आश्वासन की खैरात बांटने में लगी है. मेलघाट के जनप्रतिनिधि इस वास्तविकता को जानते है, लेकिन विदर्भ के प्रति सौतेलापन की मानसिकता भारी पड़ती नजर आ रही है. जबकि सरकार की चूले हिलाकर रख देने वाले 1994 के कुपोषण की पुनरावृत्ति होने का खतरा कोरोना काल में अत्याधिक बढ़ जाने की आशंका है. क्या यह जनप्रतिनिधि विधानमंडल में इस प्रश्न को उठाकर सरकार का ध्यान खींचने में कोई भूमिका निभा पाएंगे? 

योजनाओं की समीक्षा नहीं

प्रति वर्ष बाल मौतों पर मगरमच्छ के आंसू बहाकर सरकार कुपोषण के घाव पर मरहम लगाने का दिखावा कर रोकथाम की दिशा में योजनाओं की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी निभाने का स्वांग करती है, लेकिन क्या वास्तविकता में योजनाएं कुपोषितों तक पहुंची, उन्हें कितना लाभ हुआ. इसकी समीक्षा के लिये प्रशासन के पास फुर्सत ही नहीं है. बस कागजी घोड़े नचाकर स्वास्थ्य विभाग योजनाओं को निपटा देता है. नवसंजीवनी योजना के अंतर्गत कुपोषण पर नियंत्रण पाने के लिये वर्तमान स्थिति में एक दर्जन से अधिक योजनाएं मेलघाट में कार्यान्वित करने के लिये सरकार की तिजोरी से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये खर्च हो रहे है. मातृत्व अनुदान योजना में छठवें माह से गर्भवति को 1000 रुपये दिया जाना अनिवार्य है. क्या कभी जनप्रतिनिधियों ने इस बात की सुध लेने का प्रयास किया कि तहसील में कितनी गर्भवतियों को इस योजना में प्रति माह अनुदान मिल रहा है. क्या जिला प्रशासन समय-समय पर इसकी समीक्षा करता है या फिर इसके लिये जनप्रतिनिधि प्रशासन पर दबाव बनाते हैं. 

लोगों में जनजागृति जरुरी

बाल-माता मृत्यु के लिए प्रशासन लापरवाही जिम्मेदार है, लेकिन इसके साथ  ही यहां के लोगों में जनजागृति करना जरुरी है. क्योंकि ग्रामीण लोग प्रसुताओं को प्रसुति के लिए अस्पताल नहीं भेजते. ऐसे में जनजागृति पर जोर देना जरुरी है. साथ ही अस्पतालों में रिक्त जगहों पर भी डाक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की तुरंत नियुक्ति  की जानी चाहिए.  – राजकुमार पटेल, विधायक  

मेडिकल स्टाफ की कमी बड़ी समस्या

मेलघाट के सरकारी अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ की कमी के चलते बाल माता मृत्यु के आंकड़े बढ़े है. प्रशासन की ओर से समय पर न्यूट्रीशियन व अन्य सुविधाओं पर ध्यान दिया जा रहा है. लेकिन इसके बावजूद गत माह मौत के आंकड़ बढ़े है. – मिताली सेठी, प्रकल्प अधिकारी धारणी