संयुक्त आदिवासी कार्रवाई समिति ने दिया धरना

  • आदिवासियों की नौकरी पर अवैध रूप से कब्जा जमाए बैठे गैर-आदिवासियों का हटाएं
  • दबाव में है राजनीतिक दल

भंडारा. वास्तविक आदिवासी अपनी न्यायपूर्ण मांगों को लेकर कई वर्षों से सरकारी स्तर पर अपने न्याय के लिए लड़ रहे हैं. इस क्रम में 6 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने वास्तविक आदिवासियों के पक्ष में फैसला सुनाया. हालांकि, राज्य में इसे लागू नहीं किया. आदिवासियों की नौकरी पर अवैध रूप से कब्जा जमाए बैठे गैर-आदिवासियों हटाने की बजाए सत्ता हो या फिर विपक्ष दल वोटबैंक की खातीर इन गैर आदिवासियों की नौकरी बचाने में होड में रहता है.

सरकारी नौकरियों में घुसपैठ करने वाले, गैर-आदिवासियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई, रिक्त पदों पर वास्तविक अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की नियुक्ति, अनुसूचित जनजातियों की सूची को संवैधानिक नियमों के उल्लंघन में किसी भी जाति में शामिल नहीं करने की मांग भंडारा में आदिवासी नेताओं ने की.

आदिवासी समुदाय की विभिन्न समस्याओं एवं मांगों को पूरा करने के लिए, संयुक्त आदिवासी कार्रवाई समिति के बैनर तले सोमवार को भंडारा जिलाधिकारी कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया गया. इस आंदोलन में शामिल होने के लिए समूचे जिले से सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग आए थे. धरना प्रदर्शन स्थल पर आदिवासी समुदाय के नेताओं ने मार्गदर्शन किया एवं जनजातिय समुदाय के ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान आकर्षित किया. धरना प्रदर्शन के पश्चात शिष्टमंडल ने अपनी मांगों का ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा.

ज्ञापन में कहा गया है कि, वास्तविक आदिवासी कई वर्षों से सरकारी स्तर पर अपने न्याय के लिए लड़ रहे हैं.  6 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने वास्तविक आदिवासियों के पक्ष में फैसला सुनाया.  हालांकि, महाराष्ट्र सरकार ने उस फैसले को लागू नहीं किया.  इसके विपरीत, आदिवासियों की नौकरी पर अवैध रूप से कब्जा जमाए बैठे गैर-आदिवासियों की रक्षा की जा रही है. सरकारी नौकरियों में घुसपैठ करने वाले, गैर-आदिवासियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई, रिक्त पदों पर वास्तविक अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की नियुक्ति, अनुसूचित जनजातियों की सूची को संवैधानिक नियमों के उल्लंघन में किसी भी जाति में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. रिक्त बैकलॉग को भरा जाना चाहिए. आदिवासी संवर्ग कर्मचारियों / अधिकारियों की तत्काल पदोन्नति दी जानी चाहिए. 13 बिंदु रोस्टर के सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जाना चाहिए जो विश्वविद्यालय एवं कालेज में कार्यरत प्राध्यापकों को नौकरियों से वंचित करता है.

टाइगर प्रोजेक्ट के नाम से आदिवासियों को स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए. उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश पाने वाले उम्मीदवारों को प्रवेश प्रक्रिया से पहले जाति वैधता प्रमाण पत्र जांचा जाना चाहिए. अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूलों, माध्यमिक स्कूलों एवं जूनियर कालेजों के साथ-साथ स्नातक एवं स्नातकोत्तर कालेजों को सभी तालुका एवं जिला स्तर पर इस तरह की कारवाई की जानी चाहिए ताकि आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके. विश्वविद्यालय स्तर पर, जनजातीय अनुसंधान केंद्र एवं शानदार आदिवासी संग्रहालय के साथ-साथ नृत्य कला संस्कृत भवन को मंजूरी दी जानी चाहिए.

गोवारी समाज को लाभ न दें

आंदोलनकारियों ने मांग की है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक गोवारी समुदाय को कोई लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.  कक्षा 9 वीं से 12 वीं तक के लिए छात्रावास शुरू की जानी चाहिए.  विभिन्न मांगों सहित वास्तविक आदिवासी समुदाय के लिए पुलिस विभाग में विशेष भर्ती अभियान चलाया जाना चाहिए. इस आंदोलन में आल इंडिया आदिवासी एम्प्लाईज फेडरेशन, आर्गनायजेशन फार राईट आफ ट्रायबल, नेशनल आदिवासी पिपल्स फेडरेशन, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, युवा परिषद, गोंडवाना संघर्ष कृति समिति, आदिवासी विद्यार्थी संघ, राणी दुर्गावति आदिवासी महिला मंडल, आदिवासी हलबा/हलबी समाज कर्मचारी महासंघ आदि संघटनों ने हिस्सा लिया.

गोवर्धन कुंभरे, प्रभा पेंदाम, विनोद वट्टी, मुकेश धुर्वे, हेमराज चौधरी, डा. प्रमोद वरकडे, ज्ञानेश्वर मडावी, अजाबराव चिचामे, गणपत मडावी, डा. मधुकर कुंभरे, डा. ताराचंद येलणे, एकनाथ मडावी, धर्मराज भलावी, अशोक उइके, राजकुमार परतेती, प्रभूदास सोयाम, राजेश मरसकोल्हे, प्रीतम गोलंगे, अविनाश नैताम सहित सैकड़ों आदिवासियों ने हिस्सा लिया.