Young woman victim of online fraud, cheated on Rs 38,138 for buying a car from OLX

गोंदिया. सायबर अपराध प्रकरणों की जांच में पुलिस विभाग से बैंकों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है. सायबर पुलिस विभाग में सैकड़ों शिकायतों की जांच रुकी पड़ी है. पुलिस की मदद के लिए बैंकों को नियंत्रित करने या आदेश देने वाली कोई यंत्रणा कार्यरत नहीं होने से जांच अधिकारियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

राष्ट्रीयकृत बैंकों के खातों से ऑन लाइन पैसे चुराने के लिए अपराधी सायबर अपराध करते है. इस तरह के अपराध में पुलिस जांच की शुरुआत शिकायतकर्ता व अपराधी के बैंक खाता क्रमांक व आईएफएससी कोड से होती है. सायबर अपराधी शिकायतकर्ता की बैंक खाते से स्वयं के खातों में पैसे ट्रांसफर करते है. इतना ही नहीं खातेदारों को विभिन्न प्रकार के लालच देकर बैंक खातों में पैसे भरने के लिए कहते हैं.

इस तरह की धोखाधड़ी वाले पुलिस थाने में प्राथमिक शिकायत सायबर अपराध विभाग में भेज दी जाती है. शिकायतकर्ता के पैसे दिलाने के उद्देश्य से सायबर टीम जांच शुरु करती है. इसमें अपराधी के माध्यम से उपयोग किए गए बैंक का पता आईएफएससी कोड के माध्यम से पुलिस को लगता है.

ऐसे समय पुलिस बैंक शाखा को ई मेल कर अपराधी द्वारा धोखाधड़ी के लिए उपयोग किए बैंक खाते बंद करने कहते है. ई मेल पर बैंक ने प्रतिसाद नहीं दिया तो फोन पर आग्रह किया जाता है. बार बार रिमाईंडर मेल किए जाते है. जबकि बैंक के अधिकारी पुलिस के आग्रह को प्रतिसाद नहीं देते है.

जिससे शिकायतकर्ता को उसके पैसे मिलने में समस्या निर्माण होती है. इसी तरह जांच कार्य भी प्रभावित होता है. इस धोखाधड़ी की घटनाओं में बाहरी राज्यों के बैंक खातों का सबसे अधिक उपयोग हो रहा है. ऑन लाइन धोखाधड़ी में सायबर पुलिस विभाग के पास दाखिल शिकायतों में दुसरे राज्यों के बैंक खातों का उपयोग होने की बात सामने आई है.

ऑन लाइन धोखाधड़ी करने वालों की टोली दिल्ली, नोयडा, झारखंड, पश्चिम बंगाल व मध्यप्रदेश की है. इस टोली के सरगना उनके परिसर वाली बैंकों में फर्जी खाते खोलते है. एक टोली धोखाधड़ी के लिए अनेक बैंक खातों का उपयोग करती है. इस प्रकरण की जांच में पुलिस को अपराधियों का पता भी लग जाता है. लेकिन पुलिस विभाग की टीम उन्हें गिरफ्तार कर लाने में असमर्थ दिखाई दे रही है.