याचिका खारिज, पुनर्विचार याचिका में तथ्य नहीं : हाई कोर्ट

नागपुर. कोरोना की महामारी देशभर में फैलने के बाद इससे निपटने के लिए निधि जुटाने पीएम केयर फंड की केंद्र सरकार की ओर से घोषणा की गई. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के अंतर्गत 28 मार्च 2020 को इसके लिए ट्रस्ट की घोषणा तो की, किंतु नियमों के अनुसार अब तक 3 प्रमुख बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की नियुक्तियां नहीं होने को लेकर अधि. अरविंद वाघमारे ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की.

याचिका पर हाई कोर्ट की ओर से 27 अगस्त 2020 को ही फैसला तो सुनाया गया, किंतु इस फैसले में त्रुटियां होने का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता की ओर से पुन: पुनर्विचार याचिका दायर की गई. जिस पर लंबी सुनवाई के बाद गुरुवार को न्यायाधीश सुनील शुक्रे और न्यायाधीश अनिल किल्लोर ने याचिका में तथ्य नहीं होने का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया. याचिकाकर्ता की ओर से स्वयं वाघमारे, केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह और राज्य की ओर से अधि. देशपांडे ने पैरवी की.

सटिक संचालन की प्रणाली पर आपत्ति

अदालत का मानना था कि पंजीकरण कानून या अन्य ट्रस्ट के कानून के तहत पंजीकृत चैरिटेबल ट्रस्ट की गतिविधियों और कार्यों को सटिकता से संचालित करने की दिशा में पुख्ता प्रणाली नहीं होने की आपत्ति याचिकाकर्ता की ओर से जताई गई है. ऐसे में इस मुद्दे पर विशेष रूप से केंद्र की ओर से खुलासा होना जरूरी है.

इस मसले पर केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि पहले दायर की गई जनहित याचिका में तमाम मुद्दों को अदालत के समक्ष रखा गया है. यहां तक कि सुको में भी इस तरह की याचिका खारिज कर दी गई है. अधि. वाघमारे ने कहा कि पीएम केअर्स फंड में प्राप्त होनेवाली निधि को सार्वजनिक करने की दिशा में किसी तरह के आदेश नहीं दिए गए हैं. जबकि याचिका में इसकी प्रार्थना की गई थी. 

राजनीति से प्रेरित याचिका

केंद्र सरकार की ओर से पैरवी कर रहे अधि. सिंह ने गत सुनवाई के दौरान कहा था कि याचिकाकर्ता ने पीएम केयर फंड को पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट करार देकर इसमें 3 पदों पर देश के प्रमुख विपक्षी दल के सदस्यों को नियुक्त करने का अनुरोध किया है, जिससे प्रथमदर्शी याचिका पूरी तरह राजनीति से प्रेरित दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा कि ट्रस्ट में कौन रहेगा या कौन नहीं रहेगा. यह सुनिश्चित करने का अधिकार याचिकाकर्ता को नहीं है. याचिकाकर्ता को कोई भी अधिकार नहीं है. इस तरह की याचिकाएं पहले भी ठुकराए जाने की जानकारी अदालत को दी गई.