Lyricist Prakash Pawar

    इगतपुरी. चार हजार से अधिका गीत लिखने वाले कवी प्रकाश पवार (Poet Prakash Pawar) आज कसारा परिसर में झुग्गी झोपड़ी में रह रहे है। एक समय अपने गीतों से प्रेक्षकों की वाह वाही लेने वाले आज राज्य सरकार दे रहे दो हजार रुपए के मानदेय पर गुजरा कर रहे है। 

    कवि प्रकाश  देवला के निवासी है, पवार परिवार पिछले कई सालों से कसारा में रह रहा है। 1974 में पवार ने “बाई सुया घे ग, दाभण घे” यह गीत लिखा, जो अजर अमर हुआ, परंतु गीत लिखने वाला झुग्गी झोपड़ी में दिन काट रहा है। कुछ साल पहले पुत्र देवदत्त और बहू का निधन हुआ। जिसके बाद 8 सदस्यों का पालन पोषण करने की जिम्मेदारी प्रकाश पवार पर आई। ऐसे में भी वह स्वाभिमान के साथ जीवन बिता रहे है। 

    सरकार द्वारा मिलने वाले मानदेय पर गुजारा कर रहे है। वहीं उनके निवास के लिए सरकारी कोटे से निवास की व्यवस्था, परिवार के सदस्य को सरकारी नोकरी या आर्थिक मदद की मांग कला प्रेमी कर रहे है। 

    लोक कला युवा हर स्थिति में अपनी कला समाज तक पहुंचाता है। उद्देश एक ही होता है कि अपनी कला से समाज का प्रबोधन हो। जिससे समाज में उसकी वाह वाह होती है, परंतु कलाकार की उम्र जैसे जैसे बढ़ती है वैसे वैसे समाज सहित सरकार उसकी ओर ध्यान नहीं देता है, जो गलत है।

    - कवि प्रकाश पवार