जमीनी हकीकत पहचाने, सामंती प्रवृत्ति से बाज आए कांग्रेस

    केंद्र की सत्ता खोने के इतने वर्ष बाद भी कांग्रेस हाईकमांड के पुराने सामंती तेवर कायम हैं. न जाने क्यों कांग्रेस अन्य क्षेत्रीय विपक्षी पार्टियों को अदना  या महत्वहीन समझती है! इस तरह की अकड़ से उसे कोई फायदा नहीं, बल्कि नुकसान ही है. एक समय था जब शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे नेता कांग्रेस में थे लेकिन आज उनकी अपनी मजबूत पार्टियां हैं. 

    अपने राज्यों में उनकी गहरी पैठ और पकड़ है. वक्त के इस बदलाव को समझना कांग्रेस के लिए जरूरी है. यहां एक मिसाल दी जा सकती है कि असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जब कुछ वर्ष पूर्व कांग्रेस में थे तब असम की समस्याओं और प्रश्नों को लेकर सोनिया गांधी व राहुल गांधी से मिलना चाहते थे. वे 2 दिनों तक दिल्ली में रुके लेकिन कांग्रेस हाईकमांड ने उन्हें मिलने का वक्त नहीं दिया और उनकी उपेक्षा की. 

    ऐसे में सरमा ने बीजेपी का दामन थाम लिया. उनकी बदौलत बीजेपी असम में मजबूती से चुनाव जीती और सर्वानंद सोनोवाल की जगह पार्टी ने हिमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री पद से नवाजा. कांग्रेस झटके पर झटके खा रही है. अपने दिल्ली दौरे में टीएमसी प्रमुख और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मिलने के प्रति अनिच्छा जताते हुए कहा कि हर बार हमें सोनिया से क्यों मिलना चाहिए? 

    यह संवैधानिक रूप से बंधनकारी थोड़े ही है. ममता ने कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद और अशोक तंवर को अपनी पार्टी टीएमसी में शामिल कर लिया. वे गोवा में भी अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं. वहां के पूर्व सीएम लुइजिन्हो फलेरियो को उन्होंने टीएमसी में लिया है. अब ममता की नजर महाराष्ट्र पर भी है. 

    कुछ नेता तो यह भी मानने लगे हैं कि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस नहीं, बल्कि टीएमसी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकती है. कांग्रेस हाईकमांड को चाहिए कि जमीनी हकीकत पहचाने. क्षेत्रीय दल भी उसे शह दे रहे हैं. अपनी हेकड़ी वाली सामंती विचारधारा छोड़कर कांग्रेस स्वयं अन्य दलों से मिले. यदि उसके नेताओं की ऐसी ही वृत्ति रही तो नकारे जाएंगे.