6 वर्ष बाद भी गंगा सफाई योजना अधूरी ही

    पापनाशिनी गंगा का जल कई स्थानों पर पीने तो दूर, नहाने योग्य भी नहीं रह गया. जिसकी मुख्य वजह मानव निर्मित प्रदूषण है. गंगा किनारे शहरों व बस्तियों का गंदा पानी (सीवेज), कारखानों का दूषित जल जब इस जीवनदायिनी नदी में बहाया जाएगा तो निर्मलता कैसे रह पाएगी? गंगा की सफाई के लिए जरूरी है कि गंदगी व प्रदूषण का बाहर ही निपटान किया जाए और गंगा के प्रवाह में उसे न मिलने दिया जाए.

    केंद्र सरकार ने 13 मई 2015 को गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण व सफाई के उद्देश्य से ‘नमामि गंगे’ परियोजना को मंजूरी दी थी. खेद का विषय है कि जिस काम को युद्धस्तर पर पूरा किया जाना चाहिए था, वह गंगा सफाई योजना 6 वर्षों बाद भी अधूरी ही है.

    यदि राजनीति इच्छाशक्ति के साथ प्रशासनिक चुस्ती और व्यापक जनसहयोग रहता तो यह काम काफी तेजी से हो सकता था. वैज्ञानिक से संत (स्वामी सानंद) बन चुके जीडी अग्रवाल ने तो गंगा की धारा स्वच्छ, निर्मल और अविरल रखने के अपने प्रयासों के दौरान आमरण अनशन किया और अपने प्राणों का बलिदान दे दिया. फिर भी यह मिशन अधूरा रह गया. परियोजना के तहत सीवेज तथा चमड़ा व अन्य उद्योगों के दूषित जल के अलग निपटान या रिसाइकिल करने की 158 योजनाओं में से 68 पूरी हो गई हैं जबकि 69 योजनाओं का कार्य प्रगति पर बताया जाता है. शेष प्रोजेक्ट अभी निविदा प्रक्रिया में हैं. इस अभियान में 11,842 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं जो स्वीकृत धनराशि का 40 प्रतिशत है.

    गंगा पर बड़े बांध बनाने का विरोध भी होता रहा है. टिहरी बांध का पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने तीव्र विरोध किया था. अनेक बांध बनने से गंगा की अविरल धारा प्रभावित हुई है तथा उपजाऊ मिट्टी मैदानों तक न आकर बांध में समा जाती है. हिमालय की चट्टानें भुरभुरी होने से बड़े बांध फूटने पर विनाश का कारण बन सकते हैं. उत्तराखंड में भूस्खलन की घटनाएं इसकी चेतावनी हैं. गंगा सफाई के कार्य में तेजी लाई जाए. इसमें जो भी अवरोध आ रहे हैं, उन्हें तुरंत समाप्त किया जाए.