कभी कॉमनवेल्‍थ और एशियाई गेम्स में पदक जीत देश का नाम किया था रोशन, अब बॉक्सर सिक्‍योरिटी गार्ड की नौकरी करने पर मजबूर- जानें पूरा किस्सा

    नई दिल्ली: अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर भारत का नाम रोशन करने वाला चैंपियन मुक्केबाज (Champion Boxer) आज आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा है। इस चैंपियन की मदद करने के लिए न तो कोई बॉक्सिंग महासंघ सामने आया और न ही सरकार ने इस चैंपियन की मदद करने की सोची। एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth and Asian Games) में भारत को रजत और कांस्य पदक (Silver And Broze Medal) दिलाने वाले मुक्केबाज बिरजू साह (Boxer Birju Saha) दो समय की रोटी का जुगाड़ करने के लिए सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने के लिए मजबूर हैं। 

    भारत को दिलाए मेडल्स  

    जमशेदपुर के बॉक्सिंग प्लेयर रहे बिरजू साह का नाम कभी वर्ल्ड के टॉप 7 बॉक्सिंग प्लेयर में शामिल था। बिरजू ने भारत को साल 1994-95 में सिल्वर व ब्रॉन्ज़ मेडल एशियाई गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स (जापान) में जिताया था। बिरजू साह ने देश में खेले गए विभिन्न प्रतियोगिताओं में न जाने कितने मेडल अपने नाम किए हैं। लेकिन, आज उनकी स्थिति ऐसी है कि दो वक्त की रोटी के लिए अब बेहद परेशान रहते हैं। 

    बच्चों के छोड़ी पढ़ाई, पिता-पत्नी बीमारी से ग्रसित  

    अपने घर की ऐसी हालत देख बिरजू के बच्चों ने भी पढाई-लिखाई छोड़ दी है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से बिरजू पिछले 7 साल से सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहे हैं। वहीं बिरजू के पिता और पत्नी दोनों पैरालिसिस से ग्रसित हैं। बिरजू साह का कहना है कि, उन्होंने बॉक्सिंग को हमेशा खुद से और परिवार से ऊपर रखा। लेकिन, कहीं न कहीं सरकार और स्‍पोर्ट्स की राजनीति ने उन्हें और उनके टैलेंट को पीछे छोड़ आगे निकल गया।

    आज भी बॉक्सिंग का जुनून 

    बिरजू साह का कहना है कि, उन्हें बॉक्सिंग का जुनून आज भी उतना ही है, जितना पहले हुआ करता था। वहीं गार्ड की नौकरी बाद समय निकाल कर बिरजू बच्‍चों को बॉक्सिंग की ट्रेनिंग भी देते हैं। साथ ही वह खुद भी रोज़ प्रैक्टिस करते हैं, ताकि खुद को फिट रख सकें। उनका कहना है कि, बॉक्सिंग रिंग में उतरने के बाद वह अपना सारा दुख-दर्द भूल जाते हैं। बिरजू ने कहा कि उन्हें कोई याद रखे या न रखे, लेकिन वह जिंदगी से हमेशा लड़ते रहेंगे, क्योंकि वह कल भी एक प्लेयर थे और आज भी एक प्‍लेयर ही हैं।