Farmers
प्रतीकात्मक तस्वीर

    वर्धा. बारिश रूकने के कारण खेती के काम ने जोर पकड़ लिया है. वहीं मजदूरों की कमी के चलते सोयाबीन कटाई के साथ कपास चुनाई के रेट बढ़ने से किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ने वाला है. सितंबर में निरंतर हुई बारिश के कारण कपास, सोयाबीन की फसल पर विपरीत असर पड़ा था. सोयाबीन की फसल कटाई पर आयी थी. परंतु, सितंबर के अंतिम दिनों हुई बारिश के कारण सोयाबीन की कटाई पर बुरा असर हुआ था. किसान समय पर कटाई नहीं कर सके थे.

    बीते सप्ताह भर से बारिश ने राहत देने के कारण खेतों के कामों ने गति पकड़ी है. किसानों ने युद्धस्तर पर सोयाबीन कटाई कर उसे निकालना आरंभ किया है. अनेक किसानों के खेतों में आज भी सोयाबीन फसल खड़ी है. यह फसल उचित समय पर नहीं काटी गई तो फल्लियां फूटने का डर होने के कारण किसान मजदूरों के सामने बेबस नजर आने लगे है. परिणामवश सोयाबीन की कटाई के रेट बेहताशा वृद्धि हुई है. 

    नहीं मिल रहा हडंबा

    सोयाबीन की गंजियां खेतों में लगी है. परंतु, हडंबा नहीं मिलने के कारण किसानों के सामने दूसरी चुनौती निर्माण हुई. परिणामवश हडंबा के रेट बढ़ गये. पहले ही डीजल मंहगा होने के कारण रेट बढ़े थे. अब हडंबा की मांग बढ़ जाने के कारण उसमें और तड़का लग गया है.

    कपास चुनाई 10 रुपये प्रति किलो

    इस वर्ष कपास व सोयाबीन से किसानों को बड़ी उम्मीदें है. खेतों से कपास निकलना आरंभ हुआ है. एक ही समय पर सोयाबीन कटाई व कपास चुनाई आने के कारण मजदूरों की कमी देखने मिल रही है. मजदूर नहीं मिलने के कारण कपास चुनाई के रेट दिन ब दिन बढ़ रहे हैं. शुरूआती दौर में कपास चुनाई के प्रति किलो रेट 7 रुपए किलो तक होते थे. परंतु इस मजदुरों की कमी के कारण यह रेट 10 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुके है. किंतु फिर किसानों को कपास चुनाई के लिये मजदूर मिल पाना कठीन हो गया है. 

    कम होता है कपास का वजन 

    पौधे पर लटका हुआ कपास समय पर चुना नहीं गया तो उसकी नमी चली जाती है. इससे कपास के बोंड का वजन घट जाता है. शुरूआत में निकलने वाले कपास के बोंड का वजन 4 से 6 ग्राम तक रहता है. क्योंकि उसमें नमी होती है. वहीं यह कपास समय रहते चुना नहीं गया तो उसका वजन घट जाता है. नतीजन किसानों का घाटा सहना पड़ सकता है. 

    नहीं शुरू हुए जिनिंग फैक्टरियां

    एक और खेतों से कपास निकलना आरंभ हो गया है. वर्तमान में अनेक किसानों के घर में कपास का संचय हो गया है. परंतु, जिनिंग फैक्टरियां शुरू नहीं होने के कारण किसान अपना कपास बेच नहीं पा रहे है. समय पर कपास की चुनाई हुई तो आने वाले दिनों में कपास की आवक बढ़ सकती है. परिणामवश किसानों के सामने कपास रखने की चुनौती निर्माण हो सकती है. एक ओर सोयाबीन के दामों में गिरावट का दौर चल रहा है. वहीं  दूसरी ओर कपास के दामों में तेजी आने के कारण किसान कपास बेचकर अपनी आवश्यकता दूर कर सकते है.