कर्नाटक के बाद पुडुचेरी भी कांग्रेस के हाथ से गया दक्षिण में कांग्रेस का सूपड़ा साफ

    कांग्रेस (Congress) की असावधानी, सुस्ती और गफलत हमेशा उसे ले डूबती है. वह कोई नई जीत हासिल करना तो दूर, अपने जीते हुए प्रदेशों को भी लगातार खोती चली जा रही है. कांग्रेस हाईकमान सोता रहा और कर्नाटक के बाद उसके हाथ से पुडुचेरी भी निकल गया. अब कांग्रेस के पास सिर्फ 3 राज्य पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ बचे हैं. झारखंड और महाराष्ट्र में यह पार्टी फिसड्डी है. पुडुचेरी में संकट के लक्षण साफ दिखाई देने के बाद भी पार्टी अपनी सरकार नहीं बचा पाई.

    गोवा और मध्यप्रदेश में ठोकर खाने के बाद भी कांग्रेस स्वयं को इस केंद्र शासित प्रदेश में संभाल पाने में असमर्थ रही और उसके पैरों तले से कालीन खींच लिया गया. जब कांग्रेस के विधायक इस्तीफा देने लगे थे और किरण बेदी को पदमुक्त कर वहां तमिलिसई सौंदरराजन को उपराज्यपाल बना दिया था, तभी कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज गई थी. आखिर विधानसभा में विश्वासमत में हार के बाद मुख्यमंत्री नारायणसामी ने इस्तीफा दे दिया. सदन में प्रस्ताव पर मतदान से पहले ही मुख्यमंत्री और सत्तापक्ष के अन्य विधायकों ने बहिर्गमन किया. विधानसभा अध्यक्ष ने घोषित किया कि विश्वासमत परीक्षण में सरकार की हार हुई. 6 विधायकों के इस्तीफे के बाद नारायणसामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी.

    कांग्रेस विधायक के. लक्ष्मीनारायणन (K. Laxminarayan)और डीएमके विधायक वेंकटेशन के इस्तीफा देने के बाद 33 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन के विधायकों की संख्या घटकर 11 रह गई जबकि विपक्षी दलों के 14 विधायक हैं. पूर्व मंत्री ए. नमसिवायम और कांग्रेस के 4 विधायकों ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था जबकि पार्टी के एक अन्य विधायक को अयोग्य ठहराया गया था. मुख्यमंत्री नारायणसामी के करीबी जॉन कुमार ने भी इस्तीफा दे दिया था. विगत वर्षों में नारायणसामी का उपराज्यपाल किरण बेदी से लगातार टकराव देखा गया.

    2019 में कर्नाटक गंवाया

    जुलाई 2019 में कांग्रेस को उस समय झटका लगा था जब कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार ने इस्तीफा दे दिया था. यह सरकार सदन में विश्वास मत साबित करने में असफल रही थी. पार्टी ने इसके लिए विधायकों के विश्वासघात को जिम्मेदार माना था. इसे कर्नाटक में भाजपा के आपरेशन लोटस की सफलता माना गया. इसके बाद यहां भाजपा की सरकार बनी. 15 सीटों पर उपचुनाव हुए थे. भाजपा ने 13 दल-बदलुओं को टिकट दिया. बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी.

    गोवा में दलबदल ले डूबा

    40 सदस्यीय गोवा विधानसभा के चुनाव में सबसे अधिक 16 सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस बहुमत से वंचित थी. वहां कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया बल्कि प्रतीक्षा करती रही कि राज्यपाल उसे सबसे बड़े निर्वाचित दल के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे. ऐसा नहीं पाया. कांग्रेस ने मौका खो दिया जबकि बीजेपी ने बड़ी होशियारी से बाजी मार ली थी. कांग्रेस के 10 विधायकों को तोड़कर बीजेपी में शामिल कराने का काम चंद्रकांत कावलेकर ने किया जिन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया. बीजेपी के प्रमोद सावंत को मुख्यमंत्री बनाया गया था. कांग्रेस छोड़ने वाले 10 में से 3 विधायकों को मंत्री बना दिया गया.

    मध्यप्रदेश में 15 माह भी नहीं टिकी कांग्रेस सरकार

    मध्यप्रदेश में कांग्रेस 15 वर्ष के बाद सत्ता में लौटी थी लेकिन कमलनाथ के नेतृत्ववाली यह सरकार 15 महीने भी नहीं टिक पाई. कमलनाथ व दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा की. सिंधिया को उपमुख्यमंत्री या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से भी वंचित रखा गया. ज्योतिरादित्य के बीजेपी (BJP) में शामिल होने के बाद कांग्रेस के 25 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सदन से बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया.

    5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं चुनौती

    इस साल बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इन चुनावों में कांग्रेस के लिए जीत हासिल करना बड़ी चुनौती है. बंगाल में तो मुख्य लड़ाई इस बार भाजपा और तृणमूल के बीच की मानी जा रही है. यहां कांग्रेस लेफ्ट के साथ गठबंधन में है. वहीं तमिलनाडु में पार्टी डीएमके के साथ गठबंधन के जरिये सत्ता में आने की कोशिश करेगी. केरल में पार्टी का वाम नीत एलडीएफ से मुकाबला है. असम में कांग्रेस भाजपा को फिर से सत्ता में आने से रोकना चाहेगी.