मराठा छात्रों को न्यायालय में जाने की सलाह ना दें

  • याचिका कर्ता विनोद पाटिल का मत

औरंगाबाद. मराठा आरक्षण को अंतरिम स्थगन  मिलने के बाद सरकार नौकर भर्ती और विविध पाठयक्रम प्रवेश प्रक्रिया में शामिल मराठा छात्रों को न्यायालय में जाने की सलाह ना दे. यह मत मराठा आरक्षण के याचिका कर्ता विनोद पाटिल ने दी.

छात्रों के न्यायालय में जाने की नौबत न लाएं

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि मराठा आरक्षण को अस्थायी स्थगन देते समय न्यायालय ने स्पष्ट रुप से कहा है कि आज तक हुई भर्ती प्रक्रिया और प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव नहीं करेंगे. इस निर्णय को हुए एक माह से अधिक का समय गुजर चुका है, परंतु आज तक सरकार ने छात्रों को नियुक्तियां नहीं की है. छात्रों का शिष्टमंडल जब राज्य सरकार से मिलने पहुंचा तब छात्रों को सुप्रीम कोर्ट में जाकर आदेश का स्पष्टीकरण लाने की सलाह दी जाती है. उम्मीदवारों को नियुक्तियां दी तो न्यायालय की अवमानना होगी, ऐसा सरकार को लगता है तो सरकार  खुद क्लेरिफिकेशन ऑफ ऑर्डर्स ले. छात्रों के न्यायालय में जाने की नौबत न लाए. वरना यह मामला तीन न्यायामूर्ति के खंडपीठ के पास जाकर आरक्षण प्रकरण और अधिक गंभीर हो जाएगा. मूल याचिका 5 न्यायमूर्ति के खंडपीठ के पास प्रलंबित होने के कारण मराठा समाज को कई वर्ष फिर न्याय के प्रतीक्षा में गुजारने होंगे. ऐसे में  सरकार खुद की जिम्मेदारी से पल्ला झाडकर छात्रों को न्यायालय में जाने की सलाह न देते हुए सरकार उम्मीदवारों को नियुक्तियां देने की विनती मराठा आरक्षण के याचिकाकर्ता विनोद पाटिल ने की.