हाइब्रिड नेपियर जिले में बढ सकता है दूध उत्पादन : दूर होगी चारे की किल्लत

भंडारा. भंडारा जिला धान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है. इसके अलावा विदर्भ में सर्वाधिक दूध उत्पादन भंडारा जिले में होता है. बारिश के मौसम सभी ओर हरा चारा उपलब्ध होने से दुधारू जानवर खूब दूध देते है. लेकिन बाद में हरा चारा लगभग खत्म् हो जाता है. दूध उत्पादक किसानों को चारे की किल्लत का सामना करना पडता है. इस किल्लत को दूर करने के लिए पूरे साल उपलब्ध हो सके ऐसे चारे हायब्रीड नेपिअर को दूध उत्पादकों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए जिले के कृषि संशोधन प्रयास कर रहे है.

धान फसल निकलने के बाद इस चारे की उपलब्धता रहती है. लेकिन जैसे जैसे ठंड शबाब पर होती है, चारे की किल्लत होने लगती है. गर्मी में चारा संकट बढ जाता है. जिले में किसानों के पास में जमीन धारण क्षेत्र कम है. इस वजह से जिले में मौसमी चारा फसल पैदावार की जाती है. बरसीम, स्थानिक चारा फसलें ली जाती है. गर्मी एवं ठंड के दिनों में चारे की किल्लत का सीधा असर मवेशियों की सेहत पर पडता है. चारा महंगा होने से किसानों की बजट भी बिगड जाता है.

बहु वार्षिक चारा उत्तम विकल्प

साकोली में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की कोशिश है कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत वैरण फसल पैदावार तकनीक के माध्यम किसानों में जागृति की जाए कि इससे न सिर्फ चारे की किल्लत दूर होगी. बल्कि दूध उत्पादन बढाया भी जा सकता है. इस दिशा में काम को आगे बढाते हुए हाल ही में मासलमेटा, किन्ही, मुंडीपार, उमरी परिसर से आए किसानों को डा. एन. एस. वझिरे की उपस्थिति में प्रशिक्षण देकर प्रोत्साहित किया गया. उन्हे हायब्रीड नेपिअर के पौधे दिए गए एवं बुकलेट भी दिए गए. पशु संवर्धन व दुग्धशास्त्र विशेषज्ञ डा. पी. बी. खिरारी ने किसानों को हायब्रिड नेपिअर की भिन्निन्न जाति, रोपाई का समय, बीज का प्रमाण, खाद का प्रमाण के बारे में बताते हुए कहा कहा कि जिले में किसानों के पास में जमीन धारण क्षेत्र कम है. इस वजह से जिले में मौसमी चारा फसल पैदावार की जाती है. बरसीम, स्थानिक चारा फसल एवं अन्य घास का उत्पादन लिया जाता है. लेकिन हायब्रिड नेपिअर से चारे की किल्लत दूर की जा सकती है.

हरे चारे की जरूरत

विशेषज्ञों के अनुसार अगर जानवरों की खुराक में हरा चारा पर्याप्त रहे दूध उत्पादन अच्छा होगा. हरा चारा, सूखा चारा, खुराक की मात्रा, क्षार, जीवनसत्व, खनिज मिश्रण का प्रमाण देने से दूध उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जा सकती है.