12 साल की उम्र में घर से भाग थे, आज 40 करोड़ की कंपनियों के हैं मालिक

हमारे देश में हुनरमंद लोगों की कोई कमी नहीं है। वह संघर्ष और मेहनत के बदौलत अपनी मंज़िल तक ज़रूर पहुँच ही जाते हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक व्यक्ति की कहानी बताने जा रहे हैं, जो बहुत कम उम्र में ही अपने परिवार को छोड़कर मुंबई चले गए थे। यह कहानी दुर्गाराम चौधरी की है, जो राजस्थान के रहने वाले हैं। 

दुर्गाराम महज 12 साल की उम्र में ही वह घर पर बिना किसी को बताए ट्रेन में बैठ गए थे। उस वक्त वह बिलकुल भी यह बात नहीं जानते थे कि उन्हें कहां जाना है, क्या करना है, कहां रहना है। उनके मन में बस यही था कि कुछ करना है। दुर्गाराम मात्र 150 रुपए लेकर घर से निकले थे। लेकिन आज वह दो कंपनियों के मालिक हैं, जिनका टर्नओवर 40 करोड़ रुपए से अधिक है।  जानते हैं उनके संघर्ष के बारे में विस्तार से…

मात्र 150 रूपी लेकर भागे थे-
दुर्गाराम बताते हैं कि उनके माता पिता दोनों ही किसान थे। उन्होंने बचपन में ही सोच लिया था कि उन्हें कुछ अलग करना है। राजस्थान से अधिकतर लोग बिज़नेस के लिए साउथ जाया करते थे। दुर्गाराम बताते हैं उन्हीं लोगों को देखकर वह एक दिन घर में बिना किसी को बताए वह भी अहमदाबाद जा रही ट्रेन में बैठ गए और उनकी जेब में उस समय मात्र 150 रुपए थे। फिर ट्रेन में उन्होंने कुछ लोगों की बात सुनी वह लोग मुंबई जा रहे थे। उन्हीं की बात सुनकर दुर्गम भी मुंबई जाने का फैसला लिया। दुर्गाराम के 40 रुपए किराये में चले गए और जब वह मुंबई पहुंचे तो उनके पास मात्र 110 रुपए ही बचे थे। 

फुटपाथ पर सोए थे-
दुर्गाराम बताते हैं कि मुंबई में शुरूआती समय में वह 6-7 महीने फुटपाथ पर ही सोए थे। सीपी टैंक में एक मंदिर था, वहां जो प्रसाद बंटता था, उसी से वह पेट भरते थे। मंदिर के नज़दीक आर्य समाज का हॉल था, जहां शादियां होती थीं। वहां उन्होंने वेटर का काम शुरू कर दिया था। दुर्गाराम को एक शादी में काम करने के 15 रुपए मिलते थे। कई दिनों तक ये सिलसिला ऐसे ही चलते रहा। आर्य समाज हॉल के पास ही एक दुकानदार थे। उन्होंने दुर्गाराम की छोटी उम्र देखकर उन्हें एक घर में हाउस बॉय का काम दिलवा दिया। दुर्गाराम ने ढाई साल तक वहां काम किया। उन्होंने वहां खाना बनाना और घर संभालना सीख गए। फिर वहीं से एक डॉक्टर के घर काम करने लगे।

उसके बाद उनके मन में यह बात आई कि अगर गांव में सबको पता चलेगा कि मुंबई आकर वह खाना बनाते हैं, तो उनकी कोई इज़्ज़त नहीं रह जाएगी। इसलिए उन्होंने वह काम छोड़कर एक इलेक्ट्रीशियन की दुकान पर काम करने लगे। लेकिन, दो महीने बाद वो दुकान बंद हो गई। जिस बिल्डिंग में वो दुकान थी, वहां उस समय वीनस कंपनी के मालिक गणेश जैन रहा करते थे। वो राजस्थान से ही थे। मैडम से थोड़ी जान-पहचान हो गई थी तो उन्होंने अपने घर पर काम पर रख लिया। फिर वहां खाना बनाने लगा। फिर एक दिन उन्हें दुर्गम ने कहा कि सर “मैं ये खाना बनाने का काम नहीं करना चाहता। मैं कुछ सीखना चाहता हूं।” तो उन्होंने दुर्गम को अपनी कंपनी में कैसेट पैकिंग का काम दे दिया और कहा कि “वहां मेरे लिए खाना भी बनाना और काम भी सीखना।” डेढ़ साल तक दुर्गम ने वहीं काम किया। कुछ पैसे जोड़ लिए थे तो नया काम ढूंढ़ने का सोचकर साल 1996 में उन्होंने वह काम छोड़ दिया।

टी-सीरिज़ में सीखा कैसेट का मार्केट-
दुर्गाराम कहते हैं कि वीनस में काम करने वाली एक मैडम टी-सीरीज़ में काम करने लगीं थीं। उनके रेफरेंस से उन्हें भी टी-सीरीज़ में काम मिल गया। वहां उन्होंने काम कैसे होता है ये देखा। उन्हें नौकरी करते हुए ही ख्याल आया कि जॉब के साथ ही वह खुद भी मार्केट से कैसेट खरीदकर बाहर बेच सकते हैं। उन्होंने नौकरी के बाद वाले टाइम में कैसेट बेचना शुरू कर दिए। वह हर रोज़ मार्केट जाते थे। वह 10-12 कैसेट खरीदते और उन्हें फुटपाथ किनारे बेचा करते थे। ये काम उनका नौकरी के साथ चल रहा था। एक कैसेट पर दस से पंद्रह रुपए तक का कमीशन मिल जाता था।

उन्होंने कहा, “इस तरह रोज के डेढ़-दो सौ रुपए सैलरी के अलावा मिलने लगे। कुछ महीने बाद एक छोटी सी दुकान भी किराये पर ले ली। फिर वहां से कैसेट बेचने लगा। घर से निकलने के 9 साल बाद 2000 में घरवालों से बात हुई और उन्हें बताया कि मैं मुंबई में हूं और नौकरी कर रहा हूं। 2002 में मैंने टी-सीरीज छोड़ दी, क्योंकि उसी समय रिलायंस कम्युनिकेशन शुरू हो रहा था। उन्हें ऐसे बंदे चाहिए थे, जो इंडस्ट्री की समझ रखते हों, प्रोड्यूसर के साथ कोआर्डिनेट कर सकें। टी-सीरीज में काम करते-करते मेरे काफी प्रोड्यूसर, एक्टर-एक्ट्रेसेस से रिलेशन बन गए थे। सभी के ऑफिस में जाना होता था। इसलिए मुझे रिलायंस में काम मिल गया। रिलायंस की नौकरी के साथ ही 2004 तक मेरी दो कैसेट की दुकानें हो चुकी थीं।”फिर साल 2005 में रिंगटोन और कॉलर ट्यून का ट्रेंड आया। उस समय एक गाना लाखों में डाउनलोड होता था, लेकिन सभी गाने बॉलीवुड के होते थे। वह गुजराती, राजस्थानी, भोजपुरी गानों की कैसेट सालों से बेच रहे थे और उन्होंने देखा कि इनकी कैसेट बॉलीवुड के गानों से भी ज़्यादा बिकती हैं। उसके बाद उनके दिमाग में आया कि जब बॉलीवुड के गाने इतने ज़्यादा डाउनलोड हो रहे हैं तो रीजनल के कितने होंगे। वह जिन लोगों से कैसेट लेते थे, उन्हें बोलना शुरू किया कि “आप मुझे गाने दो, मैं इन्हें डिजिटल में कन्वर्ट करवाऊंगा। ये गाने फोन पर प्ले होंगे। कई दिनों तक किसी ने उन्हें रिस्पॉन्स नहीं दिया।”

कंपनी को ढूंढ़ते हुए मेहसाणा तक पहुंच गए-
दुर्गाराम कहते हैं कि साल 2006 में एक गुजराती गाना आया, जो काफी हिट हो रहा था। उन्होंने उसे तैयार करने वाली कंपनी को ढूंढ़ते हुए मेहसाणा तक पहुंच गए। उन्हें समझाया कि “इस गाने के राइट्स आप मुझे दो। हम इसे डिजिटल में ले जाएंगे। फायदा हो या न हो, लेकिन नुकसान कुछ नहीं होगा और वो तैयार हो गए।” अब दुर्गाराम के सामने दिक्कत ये थी कि वह नौकरी कर रहे थे। इसलिए वह उनसे एग्रीमेंट नहीं कर सकते थे। उन्होंने हंगामा कंपनी में बात की। वहां उनके कुछ दोस्त थे। उनके जरिए दुर्गाराम ने गुजरात की कंपनी से एग्रीमेंट किया। वो लोग भी रीजनल गाना अपलोड करने के लिए तैयार नहीं थे, वे लोग काफी रिक्वेस्ट के बाद माने। डेढ़ साल में ही उस गाने को 3 लाख 75 हजार बार डाउनलोड किया गया। इस डील में उन्होंने 20 लाख रुपए रॉयल्टी कमाई। 20 लाख रुपए गुजरात की कंपनी को दिलवाए और 30 परसेंट कमीशन हंगामा कंपनी को मिला।

दुर्गाराम बताते हैं कि बस इसके बाद हंगामा ने उन्होंने सारा कंटेंट अपलोड करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद उन लोगो ने दुर्गाराम को नौकरी भी ऑफर कर दी। फिर दुर्गाराम ने कहा कि “नौकरी इसी शर्त पर करूंगा कि राजस्थान, गुजरात का जो मेरा काम है, वो मेरे पास ही रहेगा।” जिसके बाद उनकी यह शर्त वे लोग मान गए। जिसका भी गाना हिट होता था वह उस कंपनी तक पहुंचता था। उससे बात करके गाने को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाता था। ये सब करते-करते साल 2012 आ गया। जहां यूट्यूब का जमाना आ चुका था। हंगामा वाले यूट्यूब पर जाने के लिए बहुत उत्साहित नहीं थे तो दुर्गम ने नौकरी छोड़ दी और खुद की कंपनी शुरू की।

दुर्गाराम को फिर जीरो से शुरूआत करना पड़ा, क्योंकि रीजनल के जितने भी उनके पार्टनर थे, उन सभी को वे हंगामा के साथ जोड़ चुके थे। उसके बाद वह उन कंपनी के मालिकों से मिले और उन्हें समझाया कि “मैंने अपनी कंपनी शुरू की है। आप अपना कंटेंट दीजिए, हम यूट्यूब पर लाएंगे।” जिसके बाद सभी ने उन्हें सपोर्ट किया। रीजनल कंटेंट तेजी से दुर्गम ने यूट्यूब पर लाए। राजस्थान की कई छोटी कंपनियों को दुर्गाराम ने एक्वायर कर लिया। साथ ही वह कोलकाता, असम, उड़ीसा भी पहुंचे। दुर्गाराम ने वहां के रीजनल गानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाए। 

साल 2017 में दुर्गम ने एनिमेशन फर्म भी इस काम के साथ शुरू कर दी। आज उनके पास 65 एम्पलाई हैं और दोनों कंपनियों का मिलाकर उनका टर्नओवर 40 करोड़ से अधिक है।” दुर्गाराम ने बहुत संघर्ष के बाद एक ऐसा मुकाम हासिल किया जो बहुत से लोगों का आज भी एक सपना ही है। उन्होंने अपनी मेहनत से अपनी कंपनी खड़ी की और उन्हें सफलता पूर्वक चला भी रहे हैं।