सुरक्षा घटाने से नाराजगी क्यों ?

नेताओं की सिक्योरिटी (Security)के दर्जे को उनके राजनीतिक कद से जोड़े जाने की मानसिकता रूढ़ हो गई है. ऐसा माना जाने लगा है कि जितनी अधिक सुरक्षा, उतना ही बड़ा नेता! सिक्योरिटी का दर्जा जरा भी कम हुआ तो नेता को बुरा लगता है. इसलिए नहीं कि उसके लिए खतरे की अनदेखी की जा रही है, बल्कि इसलिए कि उसका महत्व कम आंका जा रहा है. जब सिक्योरिटी को नेता के स्टेटस, साख या रुतबे से जोड़ दिया जाए तो इस तरह की सोच स्वाभाविक ही है.

सरकार का अपना आकलन रहता है कि किस नेता के लिए खतरे का कितना अंदेशा है, इस आधार पर वह दी गई सुरक्षा के स्तर की समीक्षा कर उसमें फेरबदल करती है. किसी की सुरक्षा बढ़ाई तो किसी की घटाई जाती है. विपक्ष के किसी भी नेता की सुरक्षा घटाई जाए तो उसे लगता है कि सरकार उसका महत्व कम कर रही है. विधानसभा में विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis), यूपी के पूर्व राज्यपाल राम नाईक (Ram Naik) तथा मनसे प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thackeray) की सुरक्षा राज्य सरकार ने घटा दी है. बीजेपी ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे बदले की राजनीति करार दिया है. दूसरी ओर सिक्योरिटी को लेकर एक अलग ही रुख सामने आया है. महाराष्ट्र के दिग्गज नेता व एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने गृह मंत्री अनिल देशमुख को फोन कर अपनी सुरक्षा कम करने के लिए कहा है.

पवार ने कहा कि यदि कोई आवश्यकता नहीं है तो मेरी सिक्योरिटी घटा दी जाए. सिक्योरिटी तो कम-अधिक रूप में पहले से ही रहती आई है परंतु विशेष रूप से आतंकवाद के उभरने के बाद से काफी जरूरी मान ली गई है. पुराने लोगों को याद है वह समय, जब प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू खुली कार में खड़े होकर जनता का अभिवादन स्वीकार करते हुए जाते थे तो उनके दर्शनों के लिए सड़क के दोनों ओर भारी भीड़ एकत्र हुआ करती थी. सिक्योरिटी में कोताही की वजह से ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या हुई. वैसे महात्मा गांधी की सुरक्षा के लिए भी तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने सादी पोशाक में पुलिसकर्मी तैनात किए थे लेकिन बापू ने इस पर आपत्ति जताई थी.

कड़ी सुरक्षा के अभाव व लोगों की तलाशी नहीं लिए जाने का नतीजा प्रार्थनासभा में उनकी हत्या के रूप में सामने आया था. ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद से इंदिरा गांधी को खतरा बढ़ गया था लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मना करने पर भी उन्होंने सतवंत सिंह व केहर सिंह को अपने अंगरक्षक के रूप में कायम रखा. इसका नतीजा उन्हें जान देकर चुकाना पड़ा था. अब हर मंत्री व विपक्ष के महत्वपूर्ण नेताओं के पास सुरक्षा है लेकिन उन्हें खतरे की कितनी आशंका है, इसका आकलन कर सिक्योरिटी का दर्जा तय किया जाता है.