कारखाना शुरू कराने विधायक स्वीकारें चुनौती

  • विवाद से एक बार फिर चर्चा में आया पांझरा-कान शक्कर कारखाना
  • 20 वर्षों से बंद पड़ी है कारखाना इकाई

साक्री. विगत 20 वर्षों से तहसील में स्थित पांझरा कान शक्कर कारखाने की बंद पड़ी इकाई विधायक मंजुला गावित के खिलाफ हुई अभद्र टिप्पणी से फिर चर्चा में आई है. विधायक मंजुला गावित के विवाद से शक्कर कारखाने का कोई लेना देना नहीं है. परंतु इसी विषय की चर्चा में उनका नाम गलत ढंग से आया और विवाद हुआ. इस विवाद के परे अब लोग विधायक से अपेक्षा कर रहे हैं कि मुद्दा बाहर आ ही गया है तो इसको चुनौती के रूप में स्वीकार कर और इस विषय पर राज्य सरकार को मना कर पांझरा कान शक्कर कारखाना शुरू करने में वे पहल करें. अब तक बीते 20 वर्षों में सैकड़ों प्रयास किए जाने के बाद भी कुछ नहीं हो पाया है, तहसील की एक समय आर्थिक जीवन रेखा मानी गई यह इकाई बंद हुई और तहसील का वैभव ही मानो खत्म हो गया है.

50 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया था कारखाना

तहसील की सिंचाई व्यवस्था और कच्चा माल गन्ने की अधिकता से 50 वर्ष पूर्व पांझरा कान कारखाना अस्तित्व में आया. कारखाने द्वारा परिसर में किसानों से लेकर आम आदमी के जीवन में समृद्धि आई. लेकिन इसके साथ ही राजनीति भी आई. जिसके चलते कई आबाद तथा कई बरबाद हुए. जिसका खामियाजा कारखाने को भी भुगतना पड़ा और भारी नुकसान, घाटा, किसानों का गन्ना देने से असहकार, भ्रष्टाचार,निकट परिसर में बाद में नए शक्कर कारखानों से हुई प्रतिस्पर्धा आदि कारणों से कारखाना दिवालिया हो गया.

3 वर्ष का मजदूरों का वेतन बकाया

कारखाने पर आज भी मजदूरों के 3 साल के वेतन का बकाया है.राज्य की शिखर (अपेक्स) बैंक का 22 करोड़ रुपए का बकाया बताया जा रहा है. भारी घाटे में चल रही यह इकाई आखिर में बंद करना पड़ी. कारखाना जब चल रहा था. तब करोड़ों रुपये का कारोबार होता था. कारखाने में काम करनेवाले कर्मियों,मजदूरों, किसानों और कारखाने के वजह से चल रहे छोटे-मोटे व्यवसायों  के जीवन में कारखाने के चलते खुशहाली आई थी. आज भी लोग और कारखाने पर आश्रित हजारों लोगों को बीते कारखाने के सुवर्ण युग की स्मृति बरकरार है.

कई बार प्रयास के बाद भी नहीं मिली सफलता

20 वर्ष बीत गए कारखाना बंद हुए, लेकिन शायद ही ऐसा हुआ होगा कि अपनी बोलचाल में लोग कारखाने को याद नहीं करते होंगे. इसी बीच मजदूरों , किसानों, तहसील के लोगों द्वारा, सैकड़ों आंदोलन, ज्ञापन, मंत्रियों, सांसद, विधायक और हाल ही में संदीप बेडसे उपमुख्मंत्री अजित पवार से मिले आदि प्रयासों से अब तक कुछ भी हाथ नहीं आ पाया है. नाशिक के उद्योगपति पिंगले, रावलगांव का वालचंद ग्रुप, बॉयलर के निर्माता सिटसन कंपनी के मालिक दिलीप भामरे आदि कई मान्यवरों द्वारा कारखाना चलाने हेतु पेशकश भी की गई. लेकिन किन्हीं कारणों के यह सब विफल रहा.

गावित से बंधी स्थानीय लोगों की आस

लोगों की हार्दिक इच्छा है, कि कुछ भी करें, कोई भी करें लेकिन कारखाना शुरू होना चाहिए. कारखाने को लेकर लोगों में संवेदनशीलता है. इसलिए लोगों में कारखाने का मुद्दा चाहे गलत कारणों से उछला हो, लेकिन आशा बंध गई है कि पांझरा-कान  कारखाना फिर से शुरू करने की इस चुनौती को विधायक मंजुला गावित स्वीकार करें.  

जनभावना का सम्मान करना जनप्रतिनिधि का फर्ज है, और भावनाओं का आदर करते हुए उसे अंजाम तक पहुंचाना आवश्यक है.जनभावना पहचानने में विधायक मंजुला गावित सक्षम हैं. वे पांझरा-कान को फिर से जीवनदान देने की जनभावनाओं की चुनौती जरूर स्वीकार करेंगी. परिसर की 4 सौ वर्ष पुरानी सिंचाई व्यवस्था, किसानों की मेहनत गन्ने की फसल के अनुकूल है और मौसम के बदले हुए मिजाज को गन्ने की फसल ही टक्कर दे सकती है. तहसील की अकेली उद्योग इकाई के पुनर्जीवित होने से परिसर का वैभव भी लौटेगा.

-सुभाष काकुस्ते, शक्कर कारखाना मजदूर संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष