तहसील के मजदूरों का पलायन शुरू

  • नेताओं के आपसी मतभेद के कारण धुलिया के दोनों गन्ना कारखानें बंद
  • गुजरात राज्य की चीनी मिलों में मिल रहा रोजगार
  • 100-200 मजदूर जोड़ों को मुकादम कारखानों को करता है आपूर्ति
  • 7 से 8 महीने अपने पैतृक गांव से ये मजदूर रहते हैं दूर

साक्री. हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी तहसील के मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है. बड़े पैमाने पर भील, कोकणी और आदिवासी समुदाय विशेष के मजदूर हर साल परिसर से गुजरात के चीनी मिलों में मजदूरी के लिए पलायन करते हैं. ये मजदूर साल के अधिकतम समय वहीं गुजारते है और गर्मियों में जैसे ही चीनी मिलों का काम थम जाता है, ये मजदूर अपनी साल भर की जमा पूंजी लेकर अपने गांव लौट आ जाते हैं. उक्त मजदूरों को लाने-ले-जाने का काम उसी परिसर के मुकादम करते हैं.

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से खड़ी हुई समस्या

कई दशकों से ये मजदूर महाराष्ट्र से गुजरात मजदूरी करने के लिए जाते हैं, जिनकी आर्थिक परिस्थिति औऱ तरक्की की ओर किसी भी राजनीतिक जनप्रतिनिधि ने उक्त स्थानांतरण पर इतने वर्षों में कोई हल नहीं ढूंढा है, ना ही इस समस्या पर कोई ध्यान दिया है. प्रशासन की उदासीनता के कारण चीनी मिलों को लगने वाले गन्ना कटाई मजदूरों का जीवन बड़ा ही संघर्षयुक्त हो गया है.

नवरात्र-दशहरा आते ही निकल पड़ते हैं कदम

जैसे ही हर वर्ष नवरात्र-दशहरा का त्यौहार आता है, परिसर के मजदूरों के कदम गुजरात की ओर चल पड़ते हैं. चीनी मिलों द्वारा नियुक्त परिसर के ही मुक़ादम उनको ट्रकों में भेंड़-बकरियों की तरह डाल कर हर वर्ष गन्ना कटाई के लिए ले जाते हैं. पति-पत्नी दोनों ही मजदूरी के लिए साथ जाते हैं. मजदूरी के लिए जाने से पहले अपने गांवों में रहते हुए इन मजदूरों को जेबखर्ची से लेकर घरखर्ची हेतु ब्याज से पैसे देकर सब से पहले शोषण मुक़ादम से शुरू होता है.

बंधुआ जैसी जिंदगी जी रहे मजदूर

इसके चलते वे मजदूर बंधुआ हो जाते हैं. जिसके चलते मजदूरी के लिए जाने के लिए मजदूर आनाकानी नहीं कर सकता. गांव लौटते समय मजदूरों का सुपरवाइजर मुक़ादम अपनी रकम ब्याज समेत निकालकर शेष बकाया उसके हाथों में थमा देता है. मुकादम का पैसा भी नहीं डूबता और मजदूर भी कहीं नहीं जाता. यह खेल दशकों से चल रहा है.

सरकारी योजनाओं से अनभिज्ञ

सरकार ने मजदूर हितों के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं, लेकिन गन्ना कटाई असंगठित मजदूरों को इन योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिला है. सरकार की योजनाएं मात्र कागज पर रह गई हैं. वहीं पर मुकादम मजदूरों और गन्ना मिलों से मोटी रकम की मलाई काट रहे हैं.

पलायन में ही खप जाती है जिंदगी

कहा जाता है कि गन्ना कटाई मजदूरों की जिंदगी और जन्म-मरण इसी प्रवास में खप जाती है, जिसका किसी को कोई सरोकार नहीं है. साक्री और शिरपुर तहसील से गुजरात राज्य की सीमा सटी हुई है. सीमावर्ती इलाकों से लगते हुए बहुत सारी चीनी मिलें हैं. मढ़ी, व्यारा, चलथान, सायन, बारडोली, जैसे इलाकों में गन्ना बड़े पैमाने पर होता है. खेतों से गन्ना की कटाई कर जन जन तक मिठास मिल तक पहुंचाने का काम ये मजदूर करते हैं.

 लावारिश की जिंदगी जीने को विवश बच्चे

नवरात्र से लेकर दिवाली तक मजदूरों को जरूरत के मुताबिक मुक़ादम भर्ती करा कर ले जाता है. एक मुक़ादम पति-पत्नी ऐसे लगभग 100- 200 मजदूर जोड़े  मजदूरों को कारखानों को आपूर्ति करता है. 7 से 8 महीने अपने पैतृक गांव से ये मजदूर दूर रहते हैं. जिसके कारण उनके बच्चे लावारिस की तरह जीवन जीने पर विवश रहते हैं न उनकी कोई उचित देखभाल होती है न कोई शिक्षा की फिक्र लेता है. जिसके कारण गन्ना कटाई मजदूर के बच्चे मुख्यधारा से कोसों दूर हैं.

साक्री और शिरपुर के कारखानों पर लटक रहे ताले

परिसर में कोई स्थाई काम नहीं है.जिसके चलते धुलिया जिले के मजदूर गुजरात पलायन करने को मजबूर हैं. ऐसा नहीं है कि  ज़िले में शक्कर कारखाने नहीं हैं. साक्री और शिरपुर तहसील का शक्कर कारखाना राजनेताओं की आपसी मतभेद के कारण बंद पड़ा है, जिसका खामियाजा गन्ना तोड़ मजदूर और किसानों को भुगतना पड़ रहा है.

कम मजदूरी के कारण अपने गांवों में रहते हुए ये मजदूर पैसा अलग से जोड़ नहीं पाते. स्थानीय परिस्थियों में खा-पी कर सब हिसाब बराबर हो जाता है. कुछ नहीं बचता. गन्ना कटाई में मजदूरों को चारा मिल जाता है, जिससे रोज का खर्चा-पानी निकल जाता है. जब मजदूर लौटता है, तब ही उसका हिसाब कर के मजदूरी अदा की जाती है. जो  मजदूर के लिए बड़ी रकम हो जाती है. ये भी गुजरात जाकर मजदूरी करने के पीछे आकर्षण है. परिसर के मजदूरों के गुजरात जाने के पश्चात खेती कामों के लिए मजदूरों की किल्लत किसानों को परेशान करती है. मजदूरी के दाम बढ़ जाते हैं. घर के सदस्यों को भी खेती के कामों में जुटना पड़ता है. हर वर्ष परिसर के बाहर जानेवाले उक्त मजदूरों के लिए कहा जाता है कि सूबे की सरकार को इनके रोजगार की व्यवस्था करना चाहिए.कोई भी रोजगार के लिए लंबी दूरी तय कर के अथवा दूसरे राज्य में नहीं जाए, इसकी जिम्मेदारी तहसील-जिला प्रशासन की है, किंतु इस पर ध्यान देने को किसी के पास समय नहीं है. चुनाव के समय इन मजदूरों को खास व्यवस्था से केवल मतदान हेतु बुलाया जाता है. उसके बाद इन मजदूरों का हवा पर छोड़ दिया जाता है. किसी को इनसे कुछ लेना-देना नहीं है. सरकारें बदली अधिकारी बदले नहीं बदली तो गन्ना मजदूरों की किस्मत. आज भी गन्ना कटाई मजदूर 2 जून की रोटी के लिए ज़िले से पलायन करने पर विवश हैं.

केवल महाराष्ट्र में 10 लाख गन्ना कटाई मजदूर हैं, ढाई लाख मजदूर अपने निकटवाले राज्य में हर साल रोजगार के लिए पलायन कर जाते हैं. मजदूरों से चीनी मिलें काम तो लेती हैं पर अपनाती नहीं, यानि उन्हें नौकरी पर स्थायी नहीं करतीं. इस वजह से अकुशल मजदूरों से भी बदतर मजदूरी देकर उनको निपटाया जाता रहा है. उनके बच्चे शिक्षा से  और मजदूर सरकारी कल्याण योजनाओं से वंचित हैं. जो एक चिंता का विषय है. सरकार इनकी सुध ले तथा  एक बेहतर जिंदगी उन्हें मिले उसकी व्यवस्था करे. -कामरेड सुभाष काकुस्ते, गन्ना कटाई मजदूर यूनियन नेता