कर ली खुद से शादी दिखाई अपनी आजादी नहीं बढ़ाएगी आबादी

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, कितनी विचित्र बात है कि गुजरात के वडोदरा में 24 वर्षीय युवती क्षमा बिंदु ने खुद से शादी कर ली. आप इसे ‘आत्मविवाह’ कह सकते हैं. उसकी शादी में हल्दी, मेहंदी और फेरे जैसी तमाम रस्में हुईं लेकिन नहीं था तो सिर्फ दूल्हा! लाल जोड़ा पहनकर उसने अपने गले का मंगलसूत्र भी दिखाया. उसके चेहरे पर मुस्कान थी. उसने कहा कि अन्य दुल्हनों के समान उसे अपना मायका छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी. उसने इस अवधारणा को तोड़ दिया कि बेटी पराया धन होती है.’’

    हमने कहा, ‘‘यह क्षमा बिंदु की सनक है या आत्ममुग्धता की धमक! खुद से इतना प्यार किया कि किसी पति के प्रेम की जरूरत ही महसूस नहीं की. विदेश में इस तरह की सोलो मैरिजेस हुई हैं लेकिन भारत में यह अपने प्रकार का पहला मामला है. समाज की परंपरा और सनातन रिवाजों को तोड़ने वाली क्षमा बिंदु को क्या क्षमा किया जाना चाहिए? इस सेल्फ मैरिज के बाद वह सेल्फ हनीमून के लिए भी जाएगी और शीशे में खुद को देखकर आत्म प्रशंसा करते हुए गाएगी- रूप मेरा ऐसा, दर्पण में ना समाय!’’

    पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, विवाह न भी हो तो प्रेम में अपोजिट जेंडर की जरूरत पड़ती है. क्या हीर ने रांझा से, सोहनी ने महिवाल से, जूलियट ने रोमियो से, लैला ने मजनूं से, अनारकली ने सलीम से मोहब्बत नहीं की?’’

    हमने कहा, ‘‘परंपरा को तोड़ने का फैसला करने में हौसला लगता है. जब दूल्हा नहीं है तो क्षमा बिंदु को चूल्हा फूंकने की जरूरत नहीं पड़ेगी. पति के नखरे नहीं उठाने पड़ेंगे. ससुराल नहीं होने से उसे कभी गाने की नौबत नहीं आएगी- मैं मायके चली जाऊंगी, तुम देखते रहियो! वह अकेले ही आत्मप्रशंसा में गुनगुनाएगी- चौदहवीं का चांद हूं या आफताब हूं, जो भी हूं खुदा की कसम, लाजवाब हूं! आइने में खुद को देखकर कहेगी- क्या खूब लगती हूं, बड़ी सुंदर दिखती हूं.’’

    पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, आप भले ही इसे पागलपन कहें लेकिन क्षमा बिंदु ने दिखा दी आजादी. जब पति ही नहीं है तो कैसे बढ़ पाएगी आबादी!’’