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राहुल गांधी और पीएम मोदी

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नई दिल्ली. मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2023) संपन्न हो गए हैं और अब सिर्फ नतीजों का इंतजार है। कांग्रेस (Congress) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दोनों राज्यों को जीतने के लिए वादों की झड़ी लगा दी है। इस विधानसभा चुनाव में जातिगत जनगणना (Caste Census) और ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) प्रमुख मुद्दों से एक रहा है। इन मुद्दों के चलते चुनाव बेहद रोचक हो गया है। कांग्रेस ने जहां राजस्थान में ओपीएस को लागू कर दिया है और दोबारा सत्ता में आने पर जातीय जनगणना कराने का ऐलान किया है। राजस्थान की तरह मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस ने यह वादे किये गए हैं। वहीं भाजपा की बात करें तो उसने खुले तौर पर ओपीएस की मांग को अस्वीकार कर दिया है। हालांकि, जातिगत जनगणना कराने को लेकर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

ओपीएस सरकारी अधिकारीयों और कर्मियों के बीच एक बड़ मुद्दा है। मध्य प्रदेश हो या राजस्थान दोनों राज्यों के अधिकारी लगातार इसे लागू करने की मांग कर रहे हैं। राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने चुनाव के छह महीने पहले ही इसे लागू करने का आदेश जारी कर दिया है। वहीं मध्य प्रदेश में सरकार बनते ही इसे लागू करने का वादा किया है। राजस्थान सरकार ने भले ही इसे लागू कर दिया है। लेकिन अभी तक यह पूरी तरह इम्प्लीमेंट नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री गहलोत ने वादा किया है कि, दोबारा सरकार में आते ही वह इसे पूरी तरह लागू का देंगे। चुनाव के समय किए इस वादों से सरकारी महकमे के अधिकारी पूरी तरह कांग्रेस पार्टी की तरफ दिखाई दे रहे हैं। जिससे दोनों राज्यों में उसे फायदा मिल सकता है। 

वहीं, भाजपा की बात करें तो वह इस स्किम को लागू करने से साफ़ इनकार कर रही है। भाजपा यूपीए सरकार के समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह अल्हुवलिया के उस बयान को दोहराती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि, अगर ओपीएस दोबारा लागू किया जाता है तो राज्य सरकारें दिवालिया हो जायेगी। वहीं निजी चैनलों द्वारा मतदान के पहले जारी किये एग्जिट पोल की बात करें तो उसमें भी यह मुद्दा कुछ खास कमाल करता नहीं दिखा रहा है। इसी को देखते हुए भाजपा इस चुनाव में इस मुद्दे को ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है।

दोनों राज्यों में 15 लाख से ज्यादा कर्मी

मध्य प्रदेश में लगभग छह लाख ऐसे कर्मचारी हैं, जो नई पेंशन स्कीम (एनपीएस) में हैं। वहीं, ओल्ड पेंशन स्कीम का लाभ लेने वाले सेवानिवृत्त कर्मी भी है जो एनपीएस कर्मियों का साथ दे रहे हैं। ओपीएस की मांग को लेकर बीते साल कर्मियों ने राजस्थान में आंदोलन भी किया था। वहीं राजस्थान में करीब 9 लाख सरकारी कर्मचारी (सेवानिवृत्त कर्मी भी शामिल) हैं। दोनों राज्यों की बात करें तो कुल 15 लाख सरकारी कर्मचारी (इसमें सेवानिवृत्त भी शामिल). यह आंकड़ा बहुत ही किसी भी चुनाव को पलटने के लिए।

जाति जनगणना 

बिहार में किये जाति जनगणना की रिपोर्ट सामने आने के बाद इसी तर्ज पर पूरे देश में करने की मांग राजनीतिक दलों और उनके नेताओं द्वारा की जा रही है। इस मांग को सामाजिक संगठनों द्वारा भी समर्थन किया जा रहा है। इस कारण यह मुद्दा एक-एक दोनों राज्यों में प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। मध्य प्रदेश में बीते 18 सालों से भाजपा की सरकार है। 2003 से लेकर 2018 के चुनाव देखें तो पिछड़ा वर्ग ने खुलकर भाजपा का साथ दिया, जिसका परिणाम वह लगातार सत्ता में पहुंची। वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो भले ही भाजपा को इस चुनाव में हार का सामान करना पड़ा, लेकिन उसे पिछड़ा वर्ग का वोट कांग्रेस से ज्यादा मिला। इसी का परिणाम रहा भाजपा 109 सीटों को जीतने में कामयाब रही। 

तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस भाजपा से ओबीसी वोटबैंक को तोड़ नहीं पाई। वहीं शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर राज्य के अधिकतर मतदाता भाजपा के पक्ष में चले जाते हैं। इसी को तोड़ने के लिए कांग्रेस ने वीपी सिंह के फार्मूला अपनाते हुए जाति जनगणना का राग छेड़ दिया है। कांग्रेस के तमाम नेता फिर चाहे राहुल गांधी हो, प्रियंका गांधी हो या राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सभी नेता अपने भाषणों और रैलियों में दोबारा सत्ता में आने पर जातीय जनगणना कराने का वादा कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं को लगता है कि, जिस तरह वीपी सिंह ने मंडल कमीशन से राम मंदिर आंदोलन की लहर को तोडा था, उसी तरह जातीय जनगणना के नाम पर मोदी के नाम पर पड़ने वाले वोटो को भाजपा से दूर किया जा सकता है। 

पिछले दिनों किये कई सर्वो में यह बात सामने आई कि, लोगों में जातीय जनगणना एक बड़ा मुद्दा है। अधिकतर लोग जहां इसके समर्थन में दिखाई दिए। वहीं भाजपा की बात करें तो पार्टी ने इस मुद्दे पर खुलकर कोई बात नहीं की है। पार्टी न विरोध कर रही है और न ही समर्थन। बिहार में जब जातीय जनगणना की बात हुई तो समर्थन के प्रस्ताव में भाजपा ने भी वोट किया।

भाजपा सहित पार्टी के तमाम बड़े नेता हो या छोटे देता यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि, वह इसके विरोध में नहीं है। भाजपा का कहना है कि पार्टी कभी भी जाति जनगणना के विचार का विरोध नहीं करती है, लेकिन वह इस मुद्दे पर वोट की राजनीति नहीं करती है। ऐसे निर्णय सावधानीपूर्वक विचार के बाद और उचित समय पर लिए जाने चाहिए। भाजपा भी जानती है देश में सबसे ज्यादा आबादी ओबीसी वोटरों की है। वहीं जातीय जनगणना का विरोध कर वह उन्हें खोना नहीं चाहती है और न ही विपक्षी को पिछड़ा विरोधी कहने का मुद्दा देना चाहती है।

वहीं राजस्थान की बाते करें तो यहाँ भी बड़ी संख्या में पिछड़ा वर्ग मतदाता है। हालांकि, यहाँ का चुनावी मिजाज मध्य प्रदेश से थोड़ा अलग है। बीते तीन दशकों से यहाँ सरकार बदलने का रिवाज रहा है। कोई भी मुद्दा जिससे राजनीतिक पार्टियों को लगता है वह वापस दोबारा सत्ता में पहुंच जाएगी वह यहां काम करते हुए दिखाई नहीं देता है। ऐसा ही इस बार भी दिखाई दे रहा है। जनता में जातीय जनगणना एक मुद्दा है, लेकिन यह जमीन पर उस तरह काम नहीं कर रहा है, जिसकी उम्मीद कांग्रेस पार्टी को है। हालांकि, चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही पता चलेगा की मुद्दा कितना चला या नहीं चला।