यही रफ्तार रही तो भविष्य में शत प्रतिशत आरक्षण होगा

    देश में सदियों से चली आ रही जाति प्रथा की वजह से अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े रह गए थे. इस कारण इन वर्गों के उत्थान और विकास के उद्देश्य से संविधान में अस्थायी तौर पर सिर्फ शुरुआती 10 वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा गया था. इसके बाद भी आरक्षण आज तक जारी है और इससे लाभान्वित होने वाला वर्ग इसे सुविधा नहीं, बल्कि अपना अधिकार मानने लगा है. आरक्षण एक बार दे दिया जाए तो फिर कभी खत्म नहीं होता और वोटों की राजनीति इसे खत्म भी नहीं होने देती.

    इस तरह कितनी भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक बराबरी आ जाए, आरक्षण अमर बना रहता है. शिक्षा, नौकरी, प्रमोशन सभी में आरक्षण लागू होता है, यहां तक कि सरकारी क्वार्टर या मकानों के एलाटमेंट में भी इसका कोटा रखा जाता है. कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि जब भारत में सभी नागरिक समान हैं तो आजादी के 7 दशक बाद भी वर्ग विशेष को आरक्षण क्यों जारी रखा जा रहा है और यह कब तक जारी रहेगा? यदि यह कहा जाए कि शैक्षणिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग का काफी उत्थान हो गया तो दलील दी जाती है कि अभी तक सामाजिक बराबरी नहीं आई है. आरक्षण की ऐसी ही रफ्तार रही तो भविष्य में शत प्रतिशत आरक्षण ही हो जाएगा.

    मराठा, जाट, पटेल का आंदोलन

    आरक्षण सिर्फ अनुसूचित जाति व जनजाति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अन्य वर्ग भी स्वयं को पिछड़ा व अवसरों से वंचित बताकर आरक्षण की मांग करते रहे हैं. ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के आरक्षण की मांग ने भी जोर पकड़ा है. इसे लेकर आंदोलन हुए और मोर्चे निकाले गए. महाराष्ट्र में जगह-जगह निकाले गए मराठा मोर्चा में हजारों लोग शामिल हुए थे. उनका यह मोर्चा मूक एवं शांतिपूर्ण रहा जिसमें कोई नारे नहीं लगाए गए लेकिन इस वर्ग ने अपनी ताकत व संगठन शक्ति का अहसास करा दिया. मराठा समुदाय ज्यादातर खेती पर निर्भर है. राज्य की हर राजनीतिक पार्टी में मराठा का वर्चस्व है लेकिन यह समुदाय स्वयं को आर्थिक, शैक्षणिक व रोजगार की दृष्टि से पिछड़ा हुआ मानता है.

    गुजरात में पटेल-पाटीदार समुदाय का आरक्षण आंदोलन काफी जोर-शोर से हुआ था जिसका नेतृत्व युवा नेता हार्दिक पटेल व जिग्नेश मेवानी ने किया था. जाटों ने भी आरक्षण की मांग को लेकर तूफानी आंदोलन किया था. इस वर्ग के लोग हरियाणा, राजस्थान व पश्चिमी उत्तरप्रदेश में बहुतायत से हैं. कर्नाटक की राजनीति में वर्चस्व रखने वाले लिंगायत भी स्वयं को पिछड़ा मानते हैं. ये सभी अपने को अन्य पिछड़ा वर्ग का बताकर आरक्षण की मांग करते रहे हैं. वोटबैंक की राजनीति में हर पार्टी उन्हें संतुष्ट करना चाहती है.

    अब राज्यों को सूची बनाने का अधिकार मिलेगा

    संविधान के अनुसार कुल आरक्षण आबादी के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं दिया जा सकता. जब भी इस मर्यादा को पार कर अतिरिक्त आरक्षण देने का प्रयास हुआ, उसे न्यायपालिका की ओर से कानूनी स्वीकृति नहीं मिल पाई. अब सरकार 127वां संविधान संशोधन बिल संसद में लाई है जिसका कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने समर्थन किया. सभी राज्य सरकारें भी इसके समर्थन में हैं. यह बिल अनुच्छेद 342-3 के तहत लागू किया जाएगा. इसके तहत राज्यों को अधिकार होगा कि वे अपने मुताबिक ओबीसी समुदाय की सूची तैयार कर सकें. संसद में बिल पास हो जाने के बाद ओबीसी समाज की लिस्ट तैयार करने के लिए राज्यों को केंद्र पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय खुद को ओबीसी वर्ग में शामिल कर आरक्षण देने की मांग कर रहा है.

    मेरिट की कीमत पर आरक्षण

    आरक्षण के औचित्य को लेकर सवाल उठाने वाले पूछते हैं कि क्या मेरिट की कीमत पर आरक्षण दिया जाना उचित है? सवर्णों ने कौन सा गुनाह किया है जो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है? आरक्षित वर्ग के 45 प्रतिशत अंक वाले को मेडिकल-इंजीनियरिंग आदि में प्रवेश मिल जाता है जबकि सवर्ण छात्र को 85-90 प्रतिशत नंबर होने के बाद भी प्रवेश नहीं मिल पाता. यही हाल सरकारी नौकरियों का भी है. प्रमोशन में भी आरक्षण दिए जाने के कारण सवर्ण तरक्की नहीं कर पाता लेकिन आरक्षित वर्ग का कर्मचारी लगातार पदोन्नति पाकर ऊंचे पद पर चला जाता है. विश्व के जिन देशों ने तरक्की की, वे प्रतिभा के बल पर आगे बढ़े, आरक्षण की बैसाखी के सहारे उन्होंने प्रगति नहीं की. आरक्षण की वजह से अवसर नहीं मिलने के कारण कितने ही प्रतिभाशाली सवर्ण उम्मीदवार विदेश चले गए. प्रतिभा पलायन या ब्रेन ड्रेन के पीछे आरक्षण भी एक वजह है जो मेरिट वालों को अवसरों से वंचित करता है.