Coronavirus
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    स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी मान लिया है कि गांवों में तेजी से कोरोना फैल रहा है. उत्तर प्रदेश में रोजाना गांवों से 27,000, उत्तराखंड में 4,500, हिमाचल में 3,800 और जम्मू-कश्मीर में लगभग 5,000 कोरोना के मरीज आ रहे हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति राजस्थान, बिहार, तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक आदि  की भी है. गांवों की स्वास्थ्य व्यवस्था का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में सरकारों और समाज के सामने चुनौती बढ़ गई है कि देश की 60 फीसदी आबादी को किस तरह स्वस्थ रखा जा सके और वहां मौतों की दरें नियंत्रित की जा सकें.

    हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और बलिया के साथ ही बिहार के बक्सर से गंगा में भारी पैमाने पर बहती लाशों के हृदयविदारक समाचार आए थे. इनमें से ज्यादातर शव उन लोगों के थे, जिन्हें महामारी ने निगल लिया. बुखार  और सर्दी-खांसी को वे सामान्य मानते रहे और उनकी दुनिया ही खत्म हो गई. आजादी के 70 वर्षों में अब तक गांवों की स्वास्थ्य सेवा स्थानीय स्तर पर प्रैक्टिस करने वाले रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर, किसी डॉक्टर के यहां 2-4 साल कंपाउंडरी करने के बाद खुद की दुकान लगाकर बैठे डॉक्टरों के जिम्मे है. गांव वालों की जान बचाने वाले इन डॉक्टरों को मीडिया ने ‘झोला-छाप’ नाम दे रखा है. इनके खिलाफ आए दिन कार्रवाई भी की जाती है.  सवाल यह है कि अब तक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने गांव वालों के इलाज के लिए क्या डॉक्टरों के लिए ऐसी कोई आचार संहिता बनाई है? हकीकत तो यह है कि ब्लॉक या क्षेत्रीय स्तर पर जो अस्पताल सरकारों ने बनवाए भी हैं, उनमें तैनात डॉक्टर अक्सर गायब रहते हैं. वे जिला मुख्यालयों पर ही रहना पसंद करते हैं. स्वास्थ्य केंद्रों पर ताला लगा है.

    सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड जैसे पिछड़े राज्यों के गांव वाले कहां जाएं. अव्वल तो होना यह चाहिए कि लक्षण आधारित इलाज के लिए जेनरिक दवाओं की किट सरकारें घर-घर बंटवाएं. सरकारों को स्थानीय स्तर पर लाउड स्पीकर आदि के जरिये लक्षणों की जानकारी देने का भी इंतजाम करना चाहिए, ताकि लोग जान सकें कि जिस सर्दी-खांसी और बुखार को वे सामान्य समझ रहे हैं, वे कितने खतरनाक हैं.