Aurangabad

    औरंगाबाद: देश में शिक्षा में सबसे पिछड़ा मुस्लिम समाज (Muslim Society) है। इस समाज को देश की मुख्यधारा में लाकर उसकी उन्नति के लिए इस समुदाय को शिक्षा (Education) और नौकरी (Jobs) में आरक्षण (Reservation) जरुरी है। शिक्षा और नौकरी में आरक्षण मिलने पर ही यह समाज उच्च शिक्षा हासिल कर पाएगा। उच्च शिक्षा हासिल करने पर वह बेहतर कमाने के लायक होगा। तब जाकर इस समाज की गरीबी दूर होगी। सरकार सचमुच मुस्लिम समाज की उन्नति चाहती है तो इस समाज को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण देने पर विद्वानों ने जोर दिया।

    मुस्लिम समाज के विकास पर चर्चा करने के लिए सेंटर फॉर डेवलमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस और दुआ फाउंडेशन की ओर से शहर एक दिवसीय परिषद का आयोजन किया गया था। परिषद के आयोजन में सांसद इम्तियाज जलील ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंच पर हैदराबाद स्थित रिसर्च सेल ऑन एज्युकेशन, सेंटर फॉर इकॉनॉमिक एंड सोशल स्टडिज के सहयोगी प्राध्यापक एवं समन्वयक डॉ. वेंकटनारायण  मोतुकरी, एड. सगीर खान, सांसद जलील उपस्थित थे। परिषद में फ्रान्स के पेरिस विश्वविद्यालय में विजिंटिंग प्रोफेसर पद पर कार्यरत और महेमुद-उर-रहमान कमेटी की रिपोर्ट तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनेवाले  डॉ. अब्दुल शाबान ने वीडियो कॉफ्रेंसिंग के माध्यम से पैरिस से मुस्लिम समाज की खस्ता हाल पर विस्तार से प्रकाश डाला। 

    शिक्षा की कमी से मुस्लिम समाज गरीब 

    डॉ. अब्दुल शाबान ने महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक क्षेत्र पर किए अभ्यास पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया कि इस समाज में शिक्षा की कमी होने से आज इस समाज में गरीबी सबसे अधिक है। शिक्षा न होने से गरीब तबके के लोग बच्चे भी अधिक पैदा करते है। ऐसे में इस समाज को शिक्षा पर अधिक जोर देने की जरुरत है। मुस्लिम समाज में लडकों के मुकाबले लडकियां अधिक शिक्षा हासिल कर रही है। समाज के बच्चों प्राथमिक के बाद बड़ी मुश्किल से हाईस्कूल तक पढ़ाई करते है। अगर, एक समय 100 बच्चे  पहली कक्षा से पढ़ाई शुरु करते हैं तो उनका 10 वीं कक्षा तक शिक्षा हासिल करने का प्रमाण सिर्फ 27 प्रतिशत रह जाता है। वहीं, 12 वीं तक शिक्षा हासिल करने वालों का प्रमाण सिर्फ 10 प्रतिशत रह पाता  है। लडकों के मुकाबले 12 वीं तक शिक्षा हासिल करनेवाली लडकियों का प्रमाण 11 प्रतिशत तक है। मुस्लिम समाज मदरसों में अधिक पढ़ाई करने का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन, महेमुद-उर-रहमान कमेटी की रिपोर्ट तैयार करते समय हमने किए सर्वें में यह बात सामने आए कि सिर्फ 2.3 प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में शिक्षा हासिल करने पहुंचते है। मदरसों से ज्यादा उर्दू स्कूलों में इस समाज के लडके/लडकियों शिक्षा हासिल करने को प्राथमिकता देते हैं। 

    75 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में  बसे हुए है

    मुस्लिम समुदाय की महाराष्ट्र की कुल जनसंख्या में  75 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में बसे हुए है। इनमें शिक्षा की कमी होने से यह लोग लेबर, प्लंबर, मेकैनिक, मजदूरी कर अपना पेट पालते है। इन लोगों के बच्चों को भी उच्च शिक्षा की जरुरत है। इसलिए इस समाज को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण सख्त जरुरी है। प्रोफेसर अब्दुल  शाबान ने मुस्लिम समुदाय के आर्थिक स्थिति पर भी विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि आज समाज के 67 प्रतिशत लोगों के मकान मिट्टी के है। समाज की  60 प्रतिशत बस्तियां और मोहल्ले मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इस समाज के अधिकतर लोग स्लम क्षेत्रों में अपना जीवन गुजार रहे हैं। 56 प्रतिशत लोगों के पास खुद की कोई वस्तु भी नहीं है। शहरों में रहनेवाले इस समाज के लोगों की स्थिति पिछले कुछ सालों में सुधरी है। उन्होंने माना कि पिछले 10 सालों में इस समाज में शिक्षा प्राप्त करने को लेकर हालत बदल रहे हैं। बच्चों में उच्च शिक्षा हासिल करने की दिलचस्पी बढ़ रही है। 

    उच्च शिक्षा और रिसर्च में काफी पिछड़ा है मुस्लिम समाज 

    डॉ. शाबान ने बताया कि यह समाज उच्च शिक्षा हासिल करने और रिसर्च करने में काफी पिछड़ा है। स्नातक तक शिक्षा हासिल करने वालों का प्रमाण कम है। जहां नाम के लिए सर्टिफिकेट दिए जाते, वहां इस समाज के बच्चे शिक्षा हासिल करने में अग्रसर हैं। फिर मुस्लिम समाज कैसे विकास करेगा? यह सवाल डॉ. शाबान ने उपस्थित कर  इस पर चिंता जताई। महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर वक्फ की संपत्तियां हैं। इन संपत्तियों पर समाज के ही कुछ लोगों ने कब्जा जमाया हुआ है। वक्फ जमीनों का इस्तेमाल समाज के बच्चों को उच्च शिक्षा हासिल कराने के साथ ही अस्पतालों के निर्माण के लिए होना चाहिए। वक्फ संपत्तियों का गलत इस्तेमाल ना हो, इस पर मुस्लिम समाज ने भी विशेष लक्ष्य केन्द्रीत करने की जरुरत है। डॉ. शाबान ने कहा कि किसी समाज को देश की मुख्यधारा में लाना है तो उसे शिक्षित करना होगा। जो समाज उच्च शिक्षा हासिल करेगा, वहीं समाज उन्नति कर पाएगा। आज महाराष्ट्र के जेलों में बंद कुल कैदियों में 30 से 40 प्रतिशत मुस्लिम समाज के है। इस पर भी डॉ. शाबान ने चिंता जताई। 

    5 साल में देश में बढ़ी गरीबी 

    परिषद में डॉ. वेंकटनारायण मोतुकरी ने देश में पिछले 5 सालों में गरीबी का प्रमाण अचानक बढऩे पर चिंता जताते हुए बताया कि  बीते 30 सालों में देश में गरीबी कम हो रही थी। गरीबी कम करने का मैथर्ड सिर्फ शिक्षा ही नहीं है।  गरीबी दूर करने के लिए गरीब लोगों को सरकार से कुछ ऐसी मदद चाहिए, जिससे वह अपनी गरीबी दूर कर सकें। गरीबी की आलम से ही मुस्लिम समाज अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दे पाता है। आज देश के आसाम, यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिसा, झारखंड में समाज में गरीबी का प्रमाण सबसे अधिक है। 

    दूसरे राज्य में रोजगार के लिए पहुंचने लगाए जा रहे प्रतिबंध 

    आजादी के बाद से यूपी, बिहार, एमपी के मुस्लिम समुदाय के लोग अपना पेट पालने महाराष्ट्र के अलावा अन्य राज्य में पहुंचते थे, लेकिन आज उन्हें दूसरे राज्य में रोजगार पाने के लिए जाने से रोका जा रहा है। उन्हें बांग्लादेशी बताकर परेशान किया जा रहा है। जिससे यह समाज आज रोजगार पाने को लेकर भी परेशान है। इस पर चिंता करने की जरुरत है। इन सारी स्थिति में इस समाज को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए शिक्षा में आरक्षण देने पर सभी विद्वानों ने बल दिया। परिषद में शहर के नामचीन डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्राध्यापक, स्कॉलर, सरकारी विभाग में कार्यरत आला अधिकारी उपस्थित थे।