Arun Gawli
File Photo : PTI

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    नागपुर. एक वर्ष से अधिक समय बाद परिवार से मिलने के लिए फरलो के तहत अवकाश के लिए सेंट्रल जेल में सजा भुगत रहे डान अरुण गवली द्वारा डीजाईजी (जेल) के पास आवेदन किया गया था किंतु अर्जी ठुकराने के बाद इसे हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई. याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने डीआईजी जेल एवं अन्य को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह में जवाब दायर करने के आदेश दिए. याचिकाकर्ता की ओर से अधि. मीर नागमन अली ने पैरवी की. अधि. अली ने कहा कि कानून के अनुसार एक वर्ष से अधिक समय तक लगातार जेल में रहने के बाद कैदी को परिवार से मिलने के लिए फरलो का अवकाश देने का प्रावधान है. इसी प्रावधान के तहत अर्जी की गई थी. लेकिन जेल प्रशासन ने राहत देने से साफ इनकार कर दिया. 

    हर समय किया आत्मसमर्पण

    याचिका पर सुनवाई के दौरान अधि. अली ने कहा कि इसके पूर्व याचिकाकर्ता को 4 बार फरलो और 5 बार पैरोल का अवकाश प्रदान किया गया है. प्रत्येक समय याचिकाकर्ता ने निर्धारित समय के भीतर जेल अधिकारी के समक्ष समर्पण किया है. यहां तक कि किसी भी समय याचिकाकर्ता द्वारा शर्तों का उल्लंघन नहीं किया गया. इसी तरह मामले के शिकायतकर्ता या गवाहों के खिलाफ भी कोई आपराधिक गतिविधियों को अंजाम नहीं दिया है. केवल संदेह के आधार पर किसी अर्जी पर निर्णय नहीं किया जा सकता है. इसके पूर्व भी याचिकाकर्ता को फरलो दिए जाने के बाद किसी तरह की घटना को अंजाम नहीं दिया गया है. 

    विरोध का ठोस कारण नहीं

    अभियोजन पक्ष की ओर से बताया गया कि इसके पूर्व में जिस समय याचिकाकर्ता को अवकाश दिया गया, उस दौरान याचिकाकर्ता की पत्नी के खिलाफ पुलिस में आपराधिक मामला दर्ज किया गया. याचिकाकर्ता ने याचिका में कहा कि 24 जनवरी 21 को फरलो के लिए आवेदन किया गया था किंतु 3 माह तक इस पर किसी तरह का निर्णय नहीं किया गया. हमेशा की तरह पुलिस विभाग की खुफिया रिपोर्ट का हवाला देकर केवल फरलो का अवकाश देने से इनकार किया गया गया है. 11 अप्रैल को अर्जी ठुकराए जाने के बाद मजबूरन हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है. दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने उक्त आदेश जारी किया. सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील एम.एम. बाराबडे ने पैरवी की.