होली विशेष: होली खेले…ज़रा प्यार से

होली वसंत की शुरुआत का प्रतीक है, यह मौसम की जीवंतता का उत्सव है। यह त्यौहार पूरे देश में धूमधाम और हर्ष- उल्लास के साथ मनाया जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की जीत है। होली में तो दुशमन भी दोस्त बन

होली वसंत की शुरुआत का प्रतीक है, यह मौसम की जीवंतता का उत्सव है। यह त्यौहार पूरे देश में धूमधाम और हर्ष- उल्लास के साथ मनाया जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की जीत है। होली में तो दुशमन भी दोस्त बन जाते है और गुलाल, पानी और रंगों के साथ होना न खेली तो क्या खेली….लेकिन लेकिन लेकिन बदलते हालातों में होली की परंपरा में कई बदलाव आते जा रहे हैं। आधुनिक होली हमारे प्रकृति, पर्यावरण के साथ साथ जीव जंतु के लिए भी घातक सिद्ध हो रही है।

यह कहना गलत नहीं होगा की अब कोई भी त्यौहार बाज़ार के प्रभाव से बचा नहीं हैं। यही कारण है की अब होली के त्यौहार ने भी नया रूप ले लिए हैं। अब प्राकृतिक रंगों के जगह रासायनिक रंग, ठंडाई की जगह नशा, पानी के रबर गुब्बारे और लोक संगीत की जगह फिल्मी गीतों ने ले लिया है। यह हर चीज़ होली के रंग में भंग डालने का काम कर रही है। प्रकृति का हर रंग बिखरता जा रहा हैं। 

कई वर्षोँ पहले रंग और गुलाल फूलों से बनाया जाता था जो त्वचा को नुकसान नहीं पहुचता था और न ही जानवरों को इससे परेशानी होती थी। जानवर इसलिए क्योंकि लोग होली की धुत में जानवरों को रंग देते है और कई बार  जानवर वह पानी पी लेते है जिसमे रंग घुला होता है और वह केमिकल से भरपूर होता है जो उनकी जान ले सकता हैं। 

आज कल पानी के गुब्बारे का भी काफी प्रचलन चला है। पानी के गुब्बारे तो हर चीज़ के लिए नुक़सानदेह हैं. जी हां इंसानों, जानवरों यहाँ तक की पर्यावरण को भी यह गुब्बारे भारी मात्रा में नुकसान पहुँचाते है। पानी के गुब्बारे हवा के गुब्बारों की तरह आमतौर पर लेटेक्स से बनाए जाते हैं, जो स्वाभाविक रूप से विघटित होते हैं। यह नुकसान तब पहुँचाते  है जब फूटे गुब्बारे जानवर निगल लेते हैं। वही इससे उनकी आंखों की रोशनी खराब हो सकती है। पानी में घुले रंग ही नहीं बल्कि सूखे रंग भी जानवरों के लिए हानिकारक होते हैं, ये रंग श्वास के जरिए जानवरों की नाक में जलन, रेस्पिरेटरी एलर्जी या इन्फेक्शन पैदा करते हैं। इनसे भी जानवरों को दूर रखना चाहिए। 

त्यौहार मनाना कोई गलत बात नहीं है लेकिन हमे इसके ढंग को बदलने की जरुरत है। ढंग यानी होलिका दहन में लकड़ियों की जगह हम गाय के गोबर से बने कन्डो का इस्तेमाल कर सकते है। इससे हमारा पर्यावरण सुरक्षित होगा साथ ही पानी का उपयोग या तो हिसाब से या फिर न किया जाए यह भी बहुत ज़रूरी हैं। वही केमिकल से बने रंगों की जगह हम फूल से बने गुलाल और रंगो का उपयोग कर सकते हैं। क्योंकि होली पर हम जिस काले रंग का उपयोग करते हैं, वह लेड ऑक्साइड से बनता है। जो किडनी और आँखों को नुकसान पहुँचता है। लाल रंग मरक्यूरी सल्फाइट के प्रयोग से बनता है। इससे त्वचा का कैंसर तक हो सकता है। प्लास्टिक बैग और गुब्बारों से भी हमे बचना चाहिए क्योंकि यह भी इंसानों जानवरों और पर्यावरण को भरपूर नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए इस बार प्रण करे की बिना किसी को नुकसान पहुचाएं होली का आनंद ले सके।