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    कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने आरएसएस (RSS) का नाम लिए बगैर कहा कि नागपुर (Nagpur) में पैदा हुई एक शक्ति पूरे देश को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. अगर प्रधानमंत्री से लोग दिल खोलकर बात नहीं कर सकते तो कोई न कोई कमी तो होगी. सभी भाषाओं, धर्मों के बीच जो खुली बात होती है. उसे हम लोकतंत्र कहते हैं लेकिन आप दिल्ली जाएंगे तो अपनी भाषा नहीं बोल पाएंगे.

    नागपुर की शक्ति इसे रोकेगी. राहुल गांधी ने इस प्रकार का आरोप तो आरएसएस पर लगा दिया कि वह देश का नियंत्रण व संचालन कर रहा है लेकिन वे अपने गिरेबां में झांककर देखें कि 10 वर्षों तक मनमोहन सिंह सरकार (Manmohan Singh Government)के समय क्या होता था. उस समय भी यही आरोप लगा करता था कि 10, जनपथ से देश का शासन चलता है. सारी महत्वपूर्ण सरकारी फाइलें मंजूरी के लिए सोनिया गांधी(Sonia Gandhi) के पास जाती थी. सारे मंत्री भी स्वयं को प्रधानमंत्री की बजाय सोनिया के प्रति जवाबदार माना करते थे. किसी संवैधानिक पद पर न रहते हुए भी यूपीए चेयरपर्सन के रूप में सोनिया गांधी सरकार की सर्वेसर्वा थी. मनमोहन सिंह की हैसियत एक कठपुतली या डमी प्रधानमंत्री की थी. जब ऐसी बात थी तो राहुल गांधी आरएसएस पर उंगली उठाने का कौन सा नैतिक अधिकार रखते हैं? राहुल को यह भी समझना चाहिए कि सरकार के दैनंदिन कामकाज में संघ कोई हस्तक्षेप नहीं करता.

    इतना अवश्य है आरएसएस की छत्रछाया में पले-बढ़े बीजेपी के नेता सरकार में रहते हुए संघ के राष्ट्रवादी संस्कारों को नहीं भूलते. अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भी मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार छोड़ना पसंद किया था लेकिन संघ से नाता तोड़ना मंजूर नहीं किया था. इन्हीं संस्कारों की वजह से वाजपेयी ने ‘तन भी हिंदू, मन भी हिंदू’ शीर्षक कविता लिखी थी. वैसे राहुल गांधी भी जान लें कि 2025 में अपने 100 वर्ष पूरे करने जा रहा आरएसएस वटवृक्ष जैसा विशाल है. इस पितृ संगठन की छाया में अनेक संगठन पनपते हैं. बीजेपी उसके समान विचार वाले संगठनों में से एक है. संघ के राजनीति में दिलचस्पी रखनेवाले नेता बीजेपी में चले जाते हैं.