महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव ऐसे हुए थे ईश्वर के प्रति समर्पित

    नई दिल्ली: प्राचीन सभ्यता और परंपरा के जरिए समाज को उचित राह दिखाने का कार्य संत द्वारा किया जाता है। समाज प्रबोधन करने में संत की अहम भूमिका होती है, संत के इस दुनिया से चले जाने के बाद भी वे अपने अमूल्य कार्य की वजह से लोगों के जेहन में हमेशा के लिए बस जाते है। जी हां आज हम बात कर रहे है महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत तुकाराम की। बता दें कि संत तुकाराम के रूप में महाराष्ट्र को  एक अद्भुत देन मिली है। जैसा कि  सब जानते है संत नामदेव न केवल एक आदर्श भक्त थे बल्कि एक समाज सुधारक भी थे। 

    उन्होंने कई महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की थी। इन साहित्यों के जरिये समाज को सुधारने का और सही दिशा दिखाने का काम किया। उन्होंने न सिर्फ आध्यात्मिक ज्ञान दिया बल्कि देश के प्रति उनका योगदान भी खास रहा, जिसे आज भी लोग याद करते है। आपको बता दें कि हर साल आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी (13) दिन बाद संत नामदेव महाराज की पुण्यतिथि मनाई जाती है। आज उनके पुण्यतिथि के अवसर पर आइए जानते है आखिर संत नामदेव  भगवान के प्रति कैसे समर्पित हुए… 

    ऐसे हुए भगवान के प्रति समर्पित 

    मिली जानकारी के मुताबिक नामदेव मौखिक यानी वाचिक परंपरा में विश्वास रखते थे, इसके पीछे भी एक वजह थी दरअसल  इनके ज्यादातर शिष्य पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए वे मौखिक यानी वाचिक तरीके से समाज प्रबोधन करते है। जी हां इनकी स्वयं की भी कोई स्कूली शिक्षा नहीं थी, फिर भी इनका समाज के बारे में अध्ययन बहुत अच्छा था,वे बहुत ज्ञानी थे। 

    संत नामदेव भजन गाते थे, और उन पर ईश्वर भक्ति में लीन होकर नाचते भी थे। इनके द्वारा लिखी गई रचनाओं को अभंग कहा जाता है, जो जीने के कई तरह के अच्छे रस्ते दिखते है। इनके गानों में ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा होती है। ईश्वर के अतिरिक्त ये हर किसी को ठुकराते हैं, जाति व्यवस्था को नहीं मानते, कर्मकांडों को व्यर्थ मानते हैं। ये ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह के रूप में गाने और संगीत को प्रयोग करते हैं,अन्याय के वृद्ध लड़ने के लिए वे अपने भजन, कीर्तन द्वारा लोगों को जगाने का कार्य करते थे। 

    महाराष्ट्र के मशहूर संत नामदेव ये वारकरी संप्रदाय से थे। उस समय यह सम्प्रदाय महाराष्ट्र में बहुत लोकप्रिय था, आज भी इसकी मान्यता उतनी ही महत्वपूर्ण है। उनके गाने और भजन गहरा आध्यात्मिक अर्थ रखते हैं। आज भी उनके द्वारा किये गए भजन, गाने के स्वरुप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचे हैं।