बेलगाम नक्सली, जिम्मेदारी लें अमित शाह

  • नक्सली नासूर को नेस्तनाबूत करें

पानी सिर से ऊपर जा रहा है. अब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं! खून के प्यासे नक्सली दरिंदों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूत करना ही होगा. कानून, संविधान, सरकार, प्रशासन किसी को भी न मानने वाले ये अराजक तत्व इंसानियत के दुश्मन हैं. इन आदमखोरों को मौत के घाट उतारना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. जब पुलिस व सुरक्षा बल की 2000 जवानों (Jawans Killed) की टीम पर 400 से ज्यादा क्रूर नक्सली घात लगाकर व घेर कर हमला कर दें तो यह मुठभेड़ नहीं, बल्कि युद्ध ही है.

अगर युद्ध छिड़ ही गया है तो उसका समापन नक्सलियों (Naxals) के समूल नाश से ही होना चाहिए. वर्गविहीन, राज्यविहीन समाज की बात करने वाले नक्सली किसी खूंखार जंगली जानवर से भी बदतर हैं. उन्हें न अमन-चैन चाहिए, न विकास. अपने प्रभाव क्षेत्र में वे जनता को शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखना चाहते हैं ताकि उनका दबदबा बना रहे. आदिवासियों का सर्वाधिक शोषण नक्सली ही करते हैं. अपने कैडर में आदिवासी स्त्री-पुरुषों को जबरन भर्ती करके उन्हें पुलिस, वनकर्मियों व प्रशासन के खिलाफ भड़काने के अलावा वे स्कूल, अस्पताल व सड़क निर्माण नहीं होने देते.

घात लगाकर हमला करते हैं

छत्तीसगढ़ के बीजापुर (Bijapur) के जोन्नागुडा जंगल में नक्सली हमले में 24 जवान शहीद हो गए तथा 31 घायल हो गए. उन्होंनें सभी ओर से घेर कर फायरिंग की. नक्सलियों ने टेकलमेटा पहाड़ी पर पहला, जोन्नागुडा के पास दूसरा तथा इसके आगे 2 किलोमीटर दूर तीसरा एम्बुश लगा रखा था. उन्होंने घायल जवानों पर चाकू, कुल्हाड़ी जैसे हथियारों से हमला कर उनके अंग क्षत-विक्षत कर डाले. जवानों की बर्बरता से हत्या करने के बाद उनके हथियार, बुलेटफ्रूफ जैकेट, टोपी, जूते और पैसे लूट ले गए.

सेना भेजने में हिचक क्यों

जब आतंकवादियों (Terrorists) के खिलाफ सेना कार्रवाई कर सकती है तो देश के दुश्मन खूंखार नक्सलियों के खिलाफ भी उसका इस्तेमाल किया जा सकता है. मोर्टार, हैंडग्रेनेड व आधुनिक हथियारों के साथ गुरिल्ला युद्ध लड़ने वाले नक्सली अत्यंत प्रशिक्षित हैं जो सैकड़ों की तादाद में टूट पड़ते हैं. वे अपने प्रभाव क्षेत्रों में समानांतर सरकार चलाते हैं. वहां कोई सरकारी कर्मचारी कदम तक नहीं रख सकता. देश के आधा दर्जन से भी ज्यादा राज्यों में सक्रिय नक्सलियों को भारत विरोधी विदेशी ताकतों का समर्थन व सहयोग हासिल है. छत्तीसगढ़ में विभिन्न सरकारों ने नक्सलियों से निपटने के लिए कई प्रयोग किए लेकिन कामयाबी नहीं मिली. सुपर कॉप केपीएस गिल को कमान सौंपी गई लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिल पाई. सल्वा जुडुम नामक तीर-कमान वाला आदिवासी संगठन बनाया गया था लेकिन वे रायफल वाले नक्सलियों के सामने टिक न सके. नगा बटालियन व कोबरा कमांडो भी नक्सलियों का सफाया नहीं कर पाए. नक्सली पशुपति (नेपाल) से तिरुपति (आंध्रप्रदेश) तक अपना प्रभाव बढ़ाने का इरादा रखते हैं. जंगल के चप्पे-चप्पे की उन्हें जानकारी है. एक राज्य में हिंसा के बाद जंगल के रास्ते दूसरे राज्य में भाग जाते हैं. जिस पर भी पुलिस का मुखबिर होने का शक हुआ, उसकी वे गांव वालों के सामने नृशंस हत्या कर देते हैं.

सघन अभियान चलाया जाए

नक्सलियों ने आज तक जितने पुलिसकर्मियों की हत्या की है, उनके परिजनों को न्याय तभी मिलेगा जब नक्सलियों का सर्वनाश कर दिया जाए. क्रांति की बात करने वाले नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र में करोड़ों रुपए प्रोटेक्शन मनी वसूल करते हैं. स्कूल, अस्पताल, सड़क, पुल बनने नहीं देते. इनके सफेदपोश समर्थक शहरों में प्राध्यापक, वकील, एनजीओ व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मौजूद हैं. नक्सलवाद राष्ट्रीय स्तर की गंभीर समस्या है जिसका केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर समाधान खोजना होगा.