अंतत: राहुल ही कमान संभालेंगे क्या पार्टी को फिर उबार पाएंगे?

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka gandhi) के प्रयासों से कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं की पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से लगभग सवा चार घंटे चर्चा हुई. इस मैराथन बैठक में वे नेता शामिल हुए जिन्होंने पार्टी में आमूल सुधार की मांग करते हुए सामूहिक चिट्ठी लिखी थी. यद्यपि पार्टी के मामलों को लेकर मुखर आवाज उठा रहे कपिल सिब्बल (Kapil sibal)  बैठक में उपस्थित नहीं थे लेकिन गुलाम नबी आजाद ने अपनी बात रखी. 20 नेताओं ने पार्टी मजबूत करने के बारे में अपने सुझाव दिए. कांग्रेस हाईकमान ने सुलह का रुख अपनाया और इस बैठक के साथ यह असमंजस खत्म हो गया कि कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा. प्राय: सभी नेताओं ने मत व्यक्त किया कि राहुल गांधी को अब सक्रिय रूप से पार्टी की कमान संभाल लेनी चाहिए. बैठक में टीम सोनिया और टीम राहुल में समन्वय पर चर्चा हुई तथा पार्टी में आपसी संवाद के लिए मजबूत तंत्र बनाने की बात कही गई ताकि किसी को शिकायत न रहे. संगठन में परिवर्तन को लेकर भी मंथन हुआ. आनेवाले राज्य विधानसभा चुनावों पर भी विचार हुआ. मुख्य बात यह रही कि पार्टी में गृह कलह और नेतृत्व संकट के बीच हुई इस बैठक में सामंजस्य व एकजुटता दिखाई दी.

वरिष्ठों के प्रति सम्मान

पत्र लिखने वाले 23 कांग्रेस नेताओं में से 20 इस बैठक में उपस्थित थे उन्होंने कहा कि ऐसा आभास कराया गया है कि वरिष्ठ नेताओं की पार्टी में जरूरत नहीं है और वे संदर्भहीन होकर रह गए हैं. इस पर सोनिया और राहुल ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी कोई बात नहीं है तथा उनके योगदान ओर विचारों की पार्टी कद्र करती है. राहुल गांधी ने कहा कि वे गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और भूपिन्दर सिंह हुड्डा जैसे वरिष्ठ नेताओं को अपने पिता राजीव गांधी का मित्र मानते हैं जिन्होंने कांग्रेस को मजबूत बनाने में योगदान दिया. राहुल ने बड़ों के प्रति सम्मान भाव रखने का वादा किया. एक तरह से यह भी कहा जाएगा कि खुली चिट्ठी लिखनेवाले नेताओं ने भी समझ लिया कि सुलह करने में ही उनकी भलाई है. गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस विखर जाएगी. भले ही पार्टी कमजोर हो गई लेकिन यही परिवार उसे एकजुट रख सकता है.

क्षमताओं को लेकर संदेह

यद्यपि राहुल गांधी ने मनोनयन की बजाय चुनाव लड़कर ही अध्यक्ष बनने की इच्छा जाहिर की है परंतु राहुल को पूर्णकालिक नेतृत्व देना होगा. वे समय-समय पर छुट्टियां बिताने विदेश चले जाते हैं. कभी तो यह भी हुआ कि संसद का सत्र चलते समय वे दिल्ली से बाहर थे. कांग्रेस मजबूत होगी तो यूपीए में भी मजबूती आएगी. मुश्किल यह भी है कि मायावती या चंद्राबाबू का रुख सीधे सोनिया से संवाद करने का रहता है. राहुल को वे जूनियर समझते हैं और नेतृत्व को लेकर उनकी क्षमताओं के प्रति आश्वस्त नहीं हैं. राहुल को अपने कृतित्व से यह भी दिखाना होगा कि बीजेपी नेता उनपर जिस तरह की छींटाकशी करते हैं, उनसे वे कहीं ऊपर हैं और उनमें मोदी को टक्कर देने का सामर्थ्य है. राहुल भी कम उम्र में जॉन केनेडी और क्लिंटन ने अमेरिका को नेतृत्व दिया था.

बुजुर्ग और युवाओं में तालमेल जरूरी

अगले कुछ महीनों में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होगा और राहुल ही कमान संभालेंगे. इसलिए वरिष्ठ और युवा नेताओं में सामंजस्य बिठाना जरूरी है. सभी ने इस खतरे को भांप लिया कि बीजेपी किस तरह राज्यों में कांग्रेस नेताओं को तोड़कर पार्टी को कमजोर करने में लगी है. इस स्थिति में पुराने नेताओं की उपयोगिता है. नए नेताओं को बढ़ाने और मार्गदर्शन में पुराने अनुभवी नेता उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. राहुल और वरिष्ठ नेताओं में तनाव तब आया था जब राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद राहुल ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था लेकिन उनके साथ अन्य नेताओं ने इस्तीफा नहीं दिया था. राहुल चाहते थे कि युवा नेताओं को अवसर दिया जाए लेकिन सोनिया का अनुभवी पुराने नेताओं की टीम पर भरोसा था. इस बैठक में पार्टी मामलों के अलावा किसान आंदोलन, गिरती अर्थव्यवस्था, कश्मीर पर रणनीति जैसे मुद्दे पर भी विचार हुआ.