भारत के महान क्रांतिवीर श्यामलाल गुप्ता

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श्यामलाल गुप्ता, जिन्हें उनके कलम नाम ‘पार्षद’ से जाना जाता है, उनकी आज 124वीं जयंती है। श्यामलाल गुप्ता एक भारतीय कवि और गीतकार थे। वह आज़ादी के आंदोलन के दौरान क्रांतिवीरों में अपने गीतों के माध्यम से नया जोश भरने का काम किया करते थे। उनके द्वारा लिखित ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ गीत को भारत के ध्वज गीत के रूप में स्वीकार किया गया और उसके बाद हर साल इस गीत को स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण समारोह के दौरान गाया जाता है। वह पद्म श्री के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार प्राप्तकर्ता भी हैं। भारत सरकार ने 1997 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

जीवन परिचय-
श्यामलाल गुप्ता का जन्म 9 सितंबर 1896 में कानपुर में जनरल गंज इलाके में हुआ था। उनके पिता विशेश्वर प्रसाद और माँ कौशल्या देवी थीं। वह श्यामलाल उनके सबसे छोटे बेटे थे। श्यामलाल ने पारिवारिक व्यवसाय में शामिल होने से इनकार कर दिया था।  जिसके बाद उन्होंने अपने कैरियर के रूप में अध्यापन कार्य किया और कानपुर के विभिन्न सरकारी स्कूलों में काम किया, साथ ही साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह वर्ष 1921 में गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सहभागिता की। उन्होंने एक व्यंग्य रचना लिखी जिसके लिए तत्कालीन अंग्रेज़ी सरकार ने उनके उपर 500 रुपये का जुर्माना लगाया। 

ध्वज गीत-
यह गीत मूल रूप से श्यामलाल गुप्ता द्वारा मार्च 1924 में एक देशभक्ति कविता के रूप में लिखा गया था। इसे कानपुर में खन्ना प्रेस द्वारा 5000 से अधिक प्रतियों के साथ जारी किया गया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस गीत को 1924 में आधिकारिक ध्वज गीत के रूप में स्वीकारा था। इसे पहली बार 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूल बाग में जलियांवाला बाग शहीद दिवस पर गाया गया था, जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने भाग लिया था। 1938 में सरोजिनी नायडू ने महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डॉ। राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, जमनालाल बजाज, महादेव देसाई और पुरुषोत्तम दास जैसे स्वतंत्रता नेताओं की उपस्थिति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में गीत प्रस्तुत किया। एक दशक के बाद, इस गीत को 1948 में रिलीज़ हुई फिल्म आज़ादी की राह पार में दिखाया गया। फिल्म का निर्देशन ललित चंद्र मेहता ने किया था और इसमें पृथ्वीराज कपूर और वनमाला पवार मुख्य भूमिकाओं में थे। शेखर कल्याण द्वारा रचित और सरोजिनी नायडू द्वारा गाया गया गीत के बारे में बताया गया है कि स्वतंत्रता से पहले की अवधि के दौरान भारतीयों में देशभक्ति की भावना जागृत होती है। इसे हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस समारोह में ध्वजारोहण समारोह के दौरान गाया जाता है।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान-
अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी और साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र के सान्निध्य में आने पर श्यामलाल ने अध्यापन, पुस्तकालयाध्यक्ष और पत्रकारिता के विविध जनसेवा कार्य किए। वह 1916 से 1947 तक पूर्णत: समर्पित कर्मठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। गणेशजी की प्रेरणा से आपने फ़तेहपुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और बाद में अपनी लगन और निष्ठा के आधार पर वर्ष 1920 में वे फ़तेहपुर ज़िला काँग्रेस के अध्यक्ष बने। इस दौरान ‘नमक आंदोलन’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रमुख संचालन किया और ज़िला परिषद कानपुर में भी वे 13 वर्षों तक रहे। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण पार्षद को रानी यशोधर के महल से 21 अगस्त 1921 को गिरफ़्तार किया गया। ज़िला कलेक्टर द्वारा उन्हें दुर्दांत क्रांतिकारी घोषित करके केंद्रीय कारागार आगरा भेज दिया गया।1930 में नमक आंदोलन के सिलसिले में पुन: गिरफ़्तार हुए और कानपुर जेल में रखे गए। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के दौरान वे चोटी के राष्ट्रीय नेताओं- मोतीलाल नेहरू, महादेव देसाई, रामनरेश त्रिपाठी और अन्य नेताओं के संपर्क में आए।

सम्मान और पुरस्कार-
1973 में उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु के बाद कानपुर और नरवल में उनके अनेकों स्मारक बने। नरवल में उनके द्वारा स्थापित बालिका विद्यालय का नाम ‘पद्मश्री श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ राजकीय बालिका इंटर कॉलेज किया गया। फूलबाग, कानपुर में ‘पद्मश्री’ श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ पुस्तकालय की स्थापना हुई। 10 अगस्त, 1994 को फूलबाग में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई। इसका अनावरण उनके 99वें जन्मदिवस पर किया गया। 

निधन-
श्यामलाल गुप्त इतने स्वाभिमानी थे कि जीवन भर अभावों में रहने के बावजूद कभी किसी से याचना नहीं की। 81 वर्ष की आयु में उन्होंने 10 अगस्त, 1977 की रात को उन्होंने अंतिम साँस ली और इस दुनिया से विदा हो गए।