12 MLC नियुक्ति का मुद्दा, राज्यपाल को इशारा अपना कर्तव्य निभाएं

    यह अभूतपूर्व है कि महाराष्ट्र सरकार ने जिन 12 नेताओं के नाम की सिफारिश राज्यपाल के पास विधान परिषद में मनोनयन के लिए भेजी, उस पर 8 माह तक राज्यपाल ने कोई निर्णय नहीं लिया. सामान्य तौर पर यह एक औपचारिकता थी और राज्यपाल तत्काल इन नामों को मंजूरी दे सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. राज्यपाल ने न तो कोई संशोधन सुझाया और न किसी नाम पर आपत्ति जताई. सरकार द्वारा भेजी गई नामों की सूची वाली फाइल भी वापस नहीं लौटाई, बल्कि उसे बगैर कोई कारण बताए अपने पास रोके रहे.

    इन 12 नामों को अब तक मंजूरी नहीं मिलने से ये नेता एमएलसी बन पाने से वंचित हैं. ऐसे में शंका होती है कि क्या केंद्र के इशारे पर राज्यपाल ने इन नामों की मंजूरी रोक रखी है? क्या वे आघाड़ी सरकार की ताकत में इजाफा होता नहीं देखना चाहते? इस तरह की बातों से राज्य सरकार व राज्यपाल के संबंधों में तनाव आता है. सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं व मंत्रियों ने राज्यपाल के इस रवैये को लेकर कई बार सवाल खड़ा किया है. 12 एमएलसी की नियुक्ति में हो रहे असाधारण विलंब को लेकर नाशिक के रतन सोली लूथ ने बाम्बे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. जब हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा तो केंद्र ने दावा किया कि विधान परिषद के सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव का जवाब देने के लिए राज्यपाल बाध्य नहीं हैं.

    मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी की पीठ ने याचिका पर सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षों से सवाल किया कि यदि राज्यपाल ने इस नियुक्ति को रोका है तो आखिर अब इस समस्या का समाधान क्या है? क्या राज्यपाल विधान परिषद की सीटों को रिक्त रख सकते हैं? 12 सीटों पर मनोनयन के प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करना राज्यपाल का संवैधानिक कर्तव्य है, इससे भागा नहीं जा सकता. यह राज्यपाल को इशारा है कि वे इन नियुक्तियों को अब और न लटकाते हुए अपना कर्तव्य निभाएं. आखिर ऐसा गतिरोध होना ही क्यों चाहिए! संघीय व्यवस्था में राज्य सरकारों के भी अपने अधिकार होते हैं. राज्यपाल से सहयोग की यदि वे उम्मीद करती हैं तो इसमें गलत क्या है?