कितनी कारगर होगी विपक्षी एकता

    एक मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा हाल ही में किए गए सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट देखी गई. फिलहाल दो चीजें मोदी के खिलाफ जा रही हैं-एक तो देश की आर्थिक स्थिति और दूसरा, कोरोना संकट को संभालने में सरकार द्वारा की कार्रवाई में कमी. संसद के मानसून सत्र में विपक्षी दलों ने एकता का दुर्लभ प्रदर्शन किया. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अब कांग्रेस पार्टी का नए गठबंधन के प्रति बड़े भाई वाला रवैया नहीं है. विपक्षी गठबंधन में प्रधानमंत्री का पद किसी के भी पास जा सकता है. 

    आधार बढ़ाने में लगी ममता

    ममता बनर्जी बंगाल के बाहर अपना आधार बढ़ा रही हैं और असम व त्रिपुरा में पैठ बना रही हैं? तृणमूल को उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह अपनी सीटों की संख्या 50 से अधिक तक ले जाएंगी. तृणमूल कांग्रेस में ज्यादातर लोग पूर्व कांग्रेसी हैं. विपक्ष के पास एक स्पष्ट रोडमैप है, जिसकी परिकल्पना चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने की थी. 

     लोकसभा में बहुमत पाने की जादुई संख्या 272 है. कांग्रेस इसका आधा यानी 136 सीटें जीतने की उम्मीद करती है, बाकी आधी सीटें गैर-कांग्रेस और गैर-राजग पार्टियों द्वारा जीते जाने की योजना है. कांग्रेस सरकार बनाने का दावा तभी करेगी, जब उसे 150 या इससे अधिक सीटें मिलेंगी, जिसकी संभावना फिलहाल बहुत कम है. सोनिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस का स्पष्ट उद्देश्य भाजपा को हराना है. कांग्रेस 2024 में प्रधानमंत्री मोदी को एक और कार्यकाल नहीं देना चाहती और इसके लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार है. कांग्रेस किसी भी वैकल्पिक सरकार का हिस्सा होगी, जिसमें भाजपा नहीं होगी. वह वित्त, गृह और विदेश मामलों जैसे मंत्रालयों पर नजर रखेगी, जहां उसके पास उस क्षेत्र की विशेषज्ञता और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य है. इससे उसका उस गठबंधन के भीतर दबदबा रहेगा.

    विपक्षी नेताओं के मैत्रीपूर्ण रिश्ते 

    विभिन्न विपक्षी दल के नेताओं के बीच के रिश्ते देखें, तो यह अधिक सौहार्दपूर्ण और मैत्रीपूर्ण है. शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और कई अन्य जैसे, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, बीजू जनता दल और यहां तक कि अकाली दल, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टी के नेता कपिल सिब्बल के आवास पर कांग्रेस के जी-23 समूह द्वारा आयोजित उनके जन्मदिन समारोह के लिए मौजूद थे.

      हालांकि कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं. उसे अपना घर व्यवस्थित करना होगा. जब तक प्रशांत किशोर औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल नहीं होते, तब तक गैर-राजग दलों के बीच समन्वय एक चुनौती है. कांग्रेस को अहमद पटेल की कमी महसूस होती है. यदि हम 1984, 1999, 2009 और 2019 को छोड़कर 1980 के दशक के बाद भारत के मतदान पैटर्न को देखें, तो देश के लोग आम तौर पर बदलाव के लिए मतदान करते हैं. वे सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मतदान करते हैं. राजीव गांधी, वी पी सिंह और पी वी नरसिंह राव चुनाव हार गए थे. वाजपेयी ने 1999 में जीत हासिल की, क्योंकि एक साल बाद चुनाव हुए थे, लेकिन 2004 में वह हार गए थे. आम तौर पर मतदाताओं द्वारा सत्ताधारी दल को जनादेश नहीं दिया जाता. मतदाताओं ने मोदी को दो मौके दिए. वर्ष 2024 में वह 74 वर्ष के हो जाएंगे. बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा को 2024 में निर्णायक जनादेश मिलेगा.

    यूपी चुनाव बीजेपी के लिए कसौटी

    उत्तर प्रदेश के चुनाव के अलावा जुलाई, 2022 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव विपक्ष के लिए लिटमस टेस्ट होंगे. आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे अहम होंगे. अगर भाजपा जीत जाती है, तो विपक्षी गठबंधन को कड़ी टक्कर देने का मौका नहीं मिलेगा. इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी के पास व्यापक स्वीकृति वाले किसी गैर-राजनीतिक व्यक्ति को मैदान में उतारने का विकल्प होगा. यदि वह अन्नाद्रमुक, बीजद, बसपा, वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को अपने खेमे में मिला लेते हैं, तो विपक्ष मजबूत चुनौती देने की स्थिति में नहीं होगा. कुल मिलाकर, वर्ष 2024 तक शह और मात का खेल जारी रहेगा.