महाराष्ट्र के बाद अब UP में भी शराब दुकानों पर दरियादिली

शराब पीने की आदत से कितने ही घर बरबाद होते हैं. कलह और जघन्य अपराधों के मूल में भी शराब ही है लेकिन फिर भी राजस्व अर्जित करने की ललक में विभिन्न सरकारें शराब के  उत्पादन और बिक्री को भरपूर बढ़ावा देती हैं. वे यह नहीं सोचतीं कि शराब की लत अपने साथ दरिद्रता और बीमारी लेकर आती है. शराबी व्यक्ति कामचोर, निकम्मा और बेरोजगार होकर समाज पर बोझ बन जाता है. वह अपना शौक पूरा करने के लिए घर का सारा सामान तक बेच डालता है. नशे में पत्नी व बच्चों से दुर्व्यवहार व मारपीट करता है. मद्यपान से लीवर खराब हो जाने पर असमय चल बसता है और परिवार को निराश्रित छोड़ जाता है. शराबी के बीमार होने पर उसके इलाज का भी तो राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को भार उठाना पड़ता है. यह सब जानते-समझते हुए भी शराब फैक्टरियों और दुकानों को धड़ल्ले से अनुमति दी जाती है. शराब के ठेके मोटी रकम में नीलाम होते हैं. गांव में एक बार पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिल पाएगा लेकिन देसी शराब जरूर मिल जाएगी. यह सभी बातें सरकार की जानकारी में हैं, फिर भी वह वर्ष में एक बार मद्यनिषेध सप्ताह या पखवाड़ा मनाकर औपचारिकता पूरी कर लेती है. नशे की छूट देने के बाद नशामुक्ति केंद्र खोलने का आखिर कौन सा औचित्य है? आखिर यह पाखंड कब तक चलेगा?

एयरपोर्ट व ट्रेन में बार खुलेंगे

महाराष्ट्र के बाद अब उत्तरप्रदेश ने भी शराब दुकानों पर दरियादिली दिखाई है. उसके लिए यह राजस्व बढ़ाने का बड़ा साधन है. यूपी सरकार की नई नियमावली के अनुसार एयरपोर्ट के लाउंज और स्पेशल ट्रेनों के साथ घरेलू व अंतरराष्ट्रीय क्रूज में भी बार खोले जाएंगे. अर्थात चलती ट्रेन और गंगा की पवित्र धारा में चलने वाले क्रूज में भी लोग मद्यपान कर सकेंगे. इसके लिए लाइसेंस देने के प्रस्ताव को राज्य सरकार ने मंजूरी दे दी है. लाइसेंस के लिए आवेदन करते समय रेस्टोरेंट के संचालन की जो अनिवार्यता थी, उसे भी खत्म कर दिया गया है. अब आबकारी आयुक्त की स्वीकृति के बाद लाइसेंस फीस जमा करने के समय तक रेस्टोरेंट संचालन अनिवार्य किया गया है. यूपी सरकार की नई बार लाइसेंस नियमावली में लाइसेंस की प्रक्रिया काफी सरल कर दी गई है. जहां तक ट्रेन व क्रूज में बार शुरू करने की बात है, वहां पीने के बाद कोई व्यक्ति साथी पैसेंजरों से उल्टी-सीधी हरकत या अभद्रता कर सकता है.

शक्कर कारखानों की वजह से शराब भी बनेगी

शराब को बढ़ावा देने के पीछे यह भी एक वजह है कि महाराष्ट्र के समान ही यूपी में गन्ने की पैदावार काफी होती है. चीनी कारखानों में शक्कर बनाने की प्रक्रिया में गन्ने का जो मोलासिस या शीरा निकलता है, वह शराब बनाने के काम आता है. महाराष्ट्र में अंगूर से वाइन बनती है. इसके अलावा सड़ा हुआ अनाज भी शराब बनाने में प्रयुक्त किया जाता है. गुड़ से रम नामक शराब बनाई जाती है. यूपी सरकार की इस छूट का लाभ उठाकर शुगर फैक्टरियों के अपशिष्ट से शराब बनाने वाली डिस्टलरीज भी खूब पनपेंगी और वाइन शॉप व बार की तादाद भी बढ़ती चली जाएगी. यूपी में पहले भी शराब निर्माता कंपनी मोहन मिकिन्स का बड़ा कारोबार रहा है.

विकास प्रभावित होता है

सामाजिक मूल्य इस तरह बदले हैं कि अब शराब पीना दूषण न होकर फैशन की निशानी बन गया है. जो नहीं पीता, उसे पिछड़ा हुआ माना जाता है. शहरों में बार और क्लबों में मद्यपान किया जाता है तो देहातों में देसी शराब पी जाती है. शराब में न कोई विटामिन होते हैं, न पोषण लेकिन फिर भी उसका चलन बढ़ता ही जा रहा है. पार्टियों, जनसंपर्क और बिजनेस डील में मद्यपान एक जरूरत बन चुका है. यदि सर्वेक्षण किया जाए तो पता चलेगा कि सरकारें जितना राजस्व शराब की बिक्री से कमाती हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान उसे लोगों के मद्यपान की वजह से उठाना पड़ता है. इससे किसान-मजदूरों की कार्यक्षमता घटती है. उनके परिवार गरीबी के दलदल में धंसते चले जाते हैं. हिंसा व अपराध बढ़ते हैं क्योंकि शराब का नशा विवेक पर परदा डाल देता है और इंसान हैवान बन जाता है. बीमार होने पर इलाज में भारी खर्च होता है. धनवान लोग तो लिमिट में पीते हैं और पौष्टिक भोजन भी कर लेते हैं लेकिन गरीब भूखा रहने पर भी शराब पी-पी कर अपना शरीर बुरी तरह खोखला कर लेता है. इससे समग्र विकास प्रभावित होता है.